NCERT Solutions Class 10 Hindi स्पर्श कविता 7: आत्मत्राण

NCERT Solutions for Class 10 Hindi स्पर्श (भाग-2) कविता 7: आत्मत्राण (रवींद्रनाथ ठाकुर)

1. SEO STRATEGY INTRODUCTION & CHAPTER MASTER OVERVIEW

सीबीएसई (CBSE) कक्षा 10 हिंदी पाठ्यक्रम ‘ब’ (Course B) की पाठ्यपुस्तक ‘स्पर्श भाग-2’ के काव्य-खंड का सातवाँ अध्याय ‘आत्मत्राण’ विश्वकवि एवं नोबेल पुरस्कार विजेता रवींद्रनाथ ठाकुर (अनुवादक: आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी) द्वारा रचित एक अत्यंत दार्शनिक और प्रेरक प्रार्थना-गीत है। बोर्ड परीक्षा के दृष्टिकोण से यह अध्याय मूल्यपरक शिक्षा (Value-based education), आशय स्पष्टीकरण और तुलनात्मक समीक्षा के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।

‘आत्मत्राण’ का शाब्दिक अर्थ है—स्वयं की रक्षा (आत्मा का त्राण)। यह कविता पारंपरिक प्रार्थनाओं से सर्वथा भिन्न है। सामान्यतः लोग ईश्वर से अपने दुखों को दूर करने और सुख-समृद्धि देने की याचना करते हैं। परंतु इस कविता में कवि ईश्वर से विपत्तियों से बचाने की गुहार नहीं लगाता, बल्कि विपत्तियों का निर्भयता से सामना करने की असीम शक्ति (आत्मबल) माँगता है। कवि की दृष्टि में ईश्वर पर अटूट विश्वास और स्वयं के पौरुष पर भरोसा ही जीवन की सबसे बड़ी पूँजी है।

परीक्षार्थियों को बोर्ड परीक्षा में उत्तर लिखते समय ‘पलायनवाद का विरोध’, ‘कर्मण्यता’, ‘आत्म-विश्वास’, और ‘समभाव (सुख-दुख में समान दृष्टि)’ जैसे पारिभाषिक शब्दों का प्रयोग करना चाहिए। यह अध्याय छात्रों को संघर्षों से भागने के बजाय उनके विरुद्ध अडिग होकर खड़े होने की अदम्य प्रेरणा देता है।

Plaintext

+---------------------------------------------------------------------------------------------------+
|                           AATMATRAN - MASTER CONCEPT ARCHITECTURE                                 |
|                                                                                                   |
|  +-----------------------------+-----------------------------+---------------------------------+  |
|  | काव्यांश / प्रार्थना का बिंदु| पारंपरिक सोच                 | कवि की अद्वितीय माँग (आत्मत्राण)|  |
|  |-----------------------------|-----------------------------|---------------------------------|  |
|  | विपदाओं (कष्टों) का आगमन    | ईश्वर कष्टों को दूर कर दे   | कष्ट सहने की शक्ति (आत्मबल) मिले|  |
|  | दुख से व्यथित हृदय          | ईश्वर सांत्वना (दिलासा) दे  | दुखों पर विजय प्राप्त करने का बल|  |
|  | जीवन में कोई सहायक न मिलना  | ईश्वर किसी सहायक को भेज दे  | अपना बल और पौरुष न डगमगाए       |  |
|  | संसार में हानि या धोखा      | ईश्वर नुकसान से बचा ले      | मन में कोई क्षय (निराशा) न हो   |  |
|  | सुख के दिन (सफलता)          | ईश्वर को भूल जाना           | सिर झुकाकर ईश्वर का स्मरण करना  |  |
|  | दुख की रात्रि (पराजय/वंचना) | ईश्वर पर संदेह/क्रोध करना   | ईश्वर के प्रति लेशमात्र भी संशय |  |
|  |                             |                             | न हो                            |  |
|  +-----------------------------+-----------------------------+---------------------------------+  |
+---------------------------------------------------------------------------------------------------+

2. NCERT पाठ्यपुस्तक अभ्यास: प्रश्न एवं आदर्श उत्तर

Question 1. कवि किससे और क्या प्रार्थना कर रहा है? [CBSE 2019, 2023]

Answer: कवि रवींद्रनाथ ठाकुर करुणामय और सर्वशक्तिमान ईश्वर (परमपिता परमात्मा) से प्रार्थना कर रहे हैं।

कवि ईश्वर से यह प्रार्थना नहीं कर रहे हैं कि वे उनके जीवन के दुखों, संकटों या विपत्तियों को दूर कर दें। इसके विपरीत, कवि शारीरिक और मानसिक आत्मबल, अदम्य साहस और निर्भयता की प्रार्थना कर रहे हैं, ताकि वे जीवन में आने वाली हर विपत्ति का डटकर सामना कर सकें। वे चाहते हैं कि विषम परिस्थितियों में भी उनका आत्मविश्वास कभी न डगमगाए और दुखों पर विजय प्राप्त करने की स्वतंत्र क्षमता उनके भीतर विकसित हो।

Question 2. ‘विपदाओं से मुझे बचाओ, यह मेरी प्रार्थना नहीं’—कवि इस पंक्ति के द्वारा क्या कहना चाहता है? [CBSE 2020, 2024]

Answer: इस पंक्ति के माध्यम से कवि जीवन के प्रति कर्मठता, यथार्थवाद और पलायनवाद के कड़े विरोध को स्पष्ट करना चाहता है।

कवि भली-भाँति जानता है कि मानव-जीवन में सुख और दुख धूप-छाँव की तरह स्वाभाविक हैं। अतः वह ईश्वर से यह चमत्कार नहीं चाहता कि उसके जीवन में कभी कोई संकट आए ही नहीं। वह विपत्तियों से बचकर कायरों की तरह भागना नहीं चाहता। वह केवल यह चाहता है कि जब विपदाएँ आएँ, तो ईश्वर उसे इतनी मानसिक दृढ़ता (आत्मबल) प्रदान करें कि वह बिना घबराए और बिना भयभीत हुए उन चुनौतियों को पार कर सके।

Question 3. कवि सहायक के न मिलने पर क्या प्रार्थना करता है? [CBSE 2018, 2022]

Answer: जीवन के कठिन संघर्षों में जब व्यक्ति अकेला पड़ जाता है और संसार का कोई भी व्यक्ति उसकी सहायता या सांत्वना के लिए आगे नहीं आता, तब कवि ईश्वर से यह अद्भुत प्रार्थना करता है कि—”हे प्रभु! ऐसी स्थिति में मेरा अपना पौरुष (पराक्रम) और मेरा आत्मबल कभी न डगमगाए।”

कवि दूसरों की सहानुभूति या बैसाखियों का मोहताज नहीं बनना चाहता। वह चाहता है कि जब बाहर से कोई सहारा न मिले, तो उसके भीतर की आध्यात्मिक शक्ति इतनी प्रबल हो कि वह अकेले ही अपने सभी कष्टों और बाधाओं का निवारण कर सके।

Question 4. अंत में कवि क्या अनुनय करता है? [BOARD EXAM FAVORITE]

Answer: कविता के अंत में कवि ईश्वर से अपने अटूट विश्वास और अडिग आस्था को बनाए रखने का अत्यंत मार्मिक अनुनय करता है।

कवि प्रार्थना करता है कि जब उसके जीवन में घोर दुख की रातें आएँ और पूरा संसार उसे धोखा दे दे, तब भी उसके मन में ईश्वर की न्यायशीलता और अस्तित्व के प्रति लेशमात्र भी संशय (संदेह) उत्पन्न न हो। अक्सर भारी विपत्तियों में मनुष्य की आस्था टूट जाती है और वह ईश्वर को दोष देने लगता है। परंतु कवि सुख और दुख दोनों ही स्थितियों में समभाव (समान भाव) रखते हुए ईश्वर के प्रति अपनी अगाध श्रद्धा को अक्षुण्ण रखना चाहता है।

Question 5. ‘आत्मत्राण’ शीर्षक की सार्थकता कविता के संदर्भ में स्पष्ट कीजिए। [CBSE 2023]

Answer: ‘आत्मत्राण’ दो शब्दों से मिलकर बना है—’आत्म’ (स्वयं/आत्मा) और ‘त्राण’ (रक्षा/भय से मुक्ति)।

यह शीर्षक पूर्णतः सार्थक और सटीक है क्योंकि पूरी कविता में कवि ने ईश्वर से अपनी रक्षा का भार उठाने को नहीं कहा है, बल्कि ‘स्वयं अपनी रक्षा करने की शक्ति’ (आत्म-त्राण की क्षमता) जाग्रत करने की याचना की है। कवि बाहरी रक्षा कवच नहीं माँगता, वह आंतरिक अजेयता माँगता है ताकि वह स्वयं अपने जीवन-रथ का सारथी बन सके। अतः यह शीर्षक कविता के कर्मवादी और स्वावलंबी मूल भाव को शत-प्रतिशत ध्वनित करता है।

Question 6. अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए आप प्रार्थना के अतिरिक्त और क्या-क्या प्रयास करते हैं?

Answer: केवल हाथ जोड़कर प्रार्थना करने से इच्छाएँ कभी पूर्ण नहीं होतीं। प्रार्थना केवल मन को एकाग्र और सकारात्मक बनाती है। अपनी इच्छाओं की वास्तविक पूर्ति के लिए हम निम्नलिखित प्रयास करते हैं:

  1. कठोर परिश्रम: लक्ष्य प्राप्ति के लिए निरंतर, योजनाबद्ध और निष्ठावान कर्म करते हैं।
  2. आत्म-मूल्यांकन: अपनी कमियों को पहचानकर उनमें सुधार करने का निरंतर प्रयास करते हैं।
  3. धैर्य और संयम: असफलता मिलने पर निराश होने के बजाय गलतियों से सीख लेकर पुनः नए उत्साह के साथ प्रयास करते हैं।
  4. स्वावलंबन: दूसरों पर निर्भर रहने के बजाय अपनी क्षमता और पौरुष पर विश्वास रखते हैं।

Question 7. क्या कवि की यह प्रार्थना आपको अन्य प्रार्थना गीतों से अलग लगती है? यदि हाँ, तो कैसे? [CBSE 2021, 2024 HOTS]

Answer: हाँ, यह प्रार्थना अन्य सभी पारंपरिक प्रार्थना गीतों से सर्वथा और मौलिक रूप से अलग है।

अन्य प्रार्थना गीतों में भक्त अत्यंत दीन-हीन और असहाय होकर ईश्वर से अपने सारे दुख दूर करने, सुख-समृद्धि देने, और जीवन की नैया को पार लगाने की याचना करता है। उसमें भक्त पूर्णतः ईश्वर पर आश्रित हो जाता है। इसके विपरीत, ‘आत्मत्राण’ में कवि दीनता या कायरता का पूर्ण तिरस्कार करता है। वह अपना बोझ ईश्वर पर नहीं डालता। वह दुखों से मुक्ति नहीं, बल्कि दुखों से लड़ने की आत्मिक शक्ति, अदम्य साहस और पौरुष माँगता है। यह कविता भक्त को स्वावलंबी, निर्भीक और कर्मवीर बनाती है।

3. भाव एवं आशय स्पष्टीकरण (दीर्घ उत्तरीय प्रश्न)

Question 8. निम्नलिखित पंक्तियों का भाव स्पष्ट कीजिए:

(क) नत शिर होकर सुख के दिन में तव मुख पहचानूँ छिन-छिन में।

Answer: भावार्थ: इन पंक्तियों में कवि ने सच्चे भक्त की विनम्रता और कृतज्ञता का सुंदर चित्रण किया है। कवि प्रार्थना करता है कि जब मेरे जीवन में सुख, सफलता और समृद्धि के दिन आएँ, तब मैं अहंकार में अंधा न हो जाऊँ। मैं अपना सिर झुकाकर (नत शिर होकर) अत्यंत विनम्रता के साथ जीवन के प्रत्येक क्षण (छिन-छिन) में ईश्वर की कृपा को याद रखूँ। प्रायः मनुष्य सुख में ईश्वर को भूल जाता है, परंतु कवि सुख के सर्वोच्च शिखर पर भी ईश्वर को अपने हृदय में बसाए रखना चाहता है।

(ख) हानि उठानी पड़े जगत में लाभ अगर वंचना रही तो भी मन में ना मानूँ क्षय।

Answer: भावार्थ: यहाँ कवि जीवन के सबसे कटु यथार्थ का सामना करने का असीम धैर्य माँगता है। कवि कहता है कि यदि इस भौतिक संसार में मुझे केवल नुकसान (हानि) ही उठाना पड़े, और सफलता/लाभ मुझे बार-बार धोखा (वंचना) देता रहे, तब भी मेरे मन में कोई क्षोभ, निराशा या टूटन (क्षय) उत्पन्न न हो। संसार के छल-कपट और निरंतर पराजय के बावजूद मेरा मनोबल और मेरी सकारात्मकता अजेय बनी रहे तथा मैं कभी हार न मानूँ।

(ग) मेरा भार अगर लघु कर के न दो सांत्वना नहीं सही। केवल इतना रखना अनुनय— वहन कर सकूँ इसको निर्भय।

Answer: भावार्थ: इन दार्शनिक पंक्तियों में कवि का कर्मठ और स्वाभिमानी स्वरूप मुखर हुआ है। कवि ईश्वर से कहता है कि हे प्रभु! यदि आप मेरे जीवन के कष्टों और दुखों का बोझ (भार) कम (लघु) नहीं करना चाहते और मुझे कोई झूठी तसल्ली (सांत्वना) नहीं देना चाहते, तो कोई बात नहीं; यह मुझे पूर्णतः स्वीकार है। मेरी आपसे केवल इतनी सी विनती (अनुनय) है कि आप मुझे इतनी शारीरिक और मानसिक शक्ति प्रदान करें कि मैं जीवन के इस भारी बोझ को बिना डरे (निर्भय होकर) स्वयं ढो सकूँ (वहन कर सकूँ)।

4. भाषा अध्ययन एवं व्यावहारिक व्याकरण

Question 9. पाठ में आए निम्नलिखित शब्दों के अर्थ और वाक्य प्रयोग लिखिए:

शब्दअर्थवाक्य प्रयोग
विपदाओंसंकटों / मुश्किलों / आपत्तियोंवीर पुरुष विपदाओं से घबराते नहीं, बल्कि उनका डटकर सामना करते हैं।
त्राणरक्षा / बचाव / भय से मुक्तिईश्वर से त्राण माँगने के बजाय हमें आत्मबल माँगना चाहिए।
व्यथितदुखी / पीड़ितमित्र को कष्ट में देखकर मेरा हृदय अत्यंत व्यथित हो उठा।
क्षयनाश / कमी / टूटनचाहे कितनी भी असफलता मिले, मेरे आत्मविश्वास का कभी क्षय नहीं होना चाहिए।
वंचनाधोखा / छलस्वार्थी लोगों से संसार में सदैव वंचना ही प्राप्त होती है।
अनुनयविनती / प्रार्थना / निवेदनमैं आपसे अनुनय करता हूँ कि आप मुझे इस संकट से लड़ने की शक्ति दें।
संशयसंदेह / शकविपत्ति के समय भी हमें ईश्वर की न्यायशीलता पर संशय नहीं करना चाहिए।
नत शिरझुका हुआ सिर / विनम्रताहमें सुख के क्षणों में भी नत शिर होकर परमात्मा का धन्यवाद करना चाहिए।

5. 15 उच्च-स्तरीय बोर्ड परीक्षा मॉडल प्रश्न (CBSE HOTS & FAQs)

Question 1. ‘आत्मत्राण’ कविता में कवि ने ‘करुणामय’ संबोधन का प्रयोग किसके लिए और क्यों किया है?

Answer: कवि ने ‘करुणामय’ संबोधन का प्रयोग ईश्वर (परमात्मा) के लिए किया है। ईश्वर स्वभाव से दयालु हैं और वे अपने भक्तों पर सदा करुणा बरसाते हैं। यद्यपि कवि उनसे अपने दुख कम करने की याचना नहीं कर रहा है, फिर भी वह उन्हें ‘करुणामय’ कहकर यह स्पष्ट करता है कि ईश्वर की सबसे बड़ी करुणा यह नहीं है कि वे मनुष्य को संघर्ष-रहित जीवन दें, बल्कि उनकी करुणा यह है कि वे मनुष्य को संघर्षों से लड़ने की अजय शक्ति (पौरुष) प्रदान करें।

Question 2. कवि सुख और दुख के प्रति कैसी दृष्टि रखना चाहता है?

Answer: कवि सुख और दुख के प्रति पूर्णतः ‘समभाव’ (समान दृष्टि) और ‘स्थितप्रज्ञ’ का दृष्टिकोण रखना चाहता है। वह सुख के दिनों में अहंकार-मुक्त होकर विनम्रतापूर्वक ईश्वर को याद करना चाहता है और दुख की घोर रात्रियों में जब सब धोखा दे दें, तब भी वह बिना विचलित हुए ईश्वर पर अटूट विश्वास बनाए रखना चाहता है। दोनों ही परिस्थितियों में वह अपना मानसिक संतुलन खोना नहीं चाहता।

Question 3. ‘दुख-ताप से व्यथित चित्त को न दो सांत्वना’—कवि सांत्वना क्यों नहीं चाहता?

Answer: कवि सांत्वना इसलिए नहीं चाहता क्योंकि सांत्वना मनुष्य को मानसिक रूप से कमज़ोर, निर्भर और दयनीय बना देती है। झूठी सहानुभूति व्यक्ति के भीतर के संघर्ष करने के जज्बे को समाप्त कर देती है। कवि स्वयं को लाचार या असहाय नहीं मानता। वह चाहता है कि वह अपनी पीड़ा पर स्वयं विजय प्राप्त करे, ताकि उसका आत्मबल और पौरुष निखर कर सामने आए।

Question 4. ‘आत्मत्राण’ कविता समाज में व्याप्त किस अकर्मण्य प्रवृत्ति पर प्रहार करती है? [CBSE HOTS]

Answer: यह कविता समाज में व्याप्त ‘पलायनवाद’ (परिस्थितियों से भागना), ‘भाग्यवादिता’ और ‘अकर्मण्यता’ (कर्म न करना) की प्रवृत्ति पर गहरा प्रहार करती है। प्रायः लोग विपत्ति आने पर भाग्य को कोसते हैं या ईश्वर से चमत्कार की उम्मीद करते हुए हाथ पर हाथ धरकर बैठ जाते हैं। यह कविता संदेश देती है कि ईश्वर भी उसी की सहायता करता है जो अपनी सहायता स्वयं (पौरुष और कर्म के माध्यम से) करता है।

Question 5. क्या ‘आत्मत्राण’ कविता में कवि ईश्वर के अस्तित्व पर संदेह करता है? स्पष्ट कीजिए।

Answer: बिल्कुल नहीं। कवि ईश्वर के अस्तित्व पर रत्ती भर भी संदेह नहीं करता। इसके विपरीत, कविता की अंतिम पंक्तियों—“दुख रात्रि में करे वंचना मेरी जिस दिन निखिल मही, उस दिन ऐसा हो करुणामय, तुम पर करूँ नहीं कुछ संशय”—से यह सिद्ध होता है कि कवि का ईश्वर पर विश्वास इतना अगाध और अटूट है कि यदि पूरी पृथ्वी भी उसके विरुद्ध हो जाए, तब भी उसकी ईश्वरीय आस्था में कोई कमी नहीं आएगी।

Question 6. ‘आत्मत्राण’ और ‘मनुष्यता’ (मैथिलीशरण गुप्त) कविता के मूल संदेशों में क्या समानता है?

Answer: दोनों ही कविताएँ मानव को कर्मठ, साहसी और आंतरिक रूप से सबल बनने की प्रेरणा देती हैं। ‘मनुष्यता’ कविता जहाँ परोपकार और परस्पर सहयोग (तारता हुआ तरे) का संदेश देती है तथा विपत्तियों को ढकेलने की बात करती है, वहीं ‘आत्मत्राण’ विपत्तियों से स्वयं लड़ने का आत्मबल जाग्रत करने का संदेश देती है। दोनों कविताओं के केंद्र में कायरता का त्याग और मनुष्य के उच्च आदर्शों की स्थापना है।

Question 7. ‘वहन कर सकूँ इसको निर्भय’—में ‘इसको’ शब्द का प्रयोग किसके लिए हुआ है?

Answer: यहाँ ‘इसको’ शब्द का प्रयोग जीवन में आने वाले भारी कष्टों, दुखों, उत्तरदायित्वों और विपत्तियों के उस बोझ (भार) के लिए हुआ है, जिसे ढोना एक साधारण मनुष्य के लिए अत्यंत कठिन होता है। कवि इस बोझ से मुक्ति नहीं, बल्कि इसे निर्भयतापूर्वक वहन करने की शक्ति चाहता है।

Question 8. ‘निखिल मही’ का अर्थ स्पष्ट करते हुए बताइए कि यह किस स्थिति का द्योतक है?

Answer: ‘निखिल मही’ का अर्थ है—संपूर्ण पृथ्वी या पूरा संसार। यह उस चरम निराशाजनक स्थिति का द्योतक है जब जीवन के कठिनतम दौर में मनुष्य के सभी सगे-संबंधी, मित्र और समाज उसका साथ छोड़ देते हैं (वंचना/धोखा देते हैं) और वह दुनिया में बिल्कुल अकेला पड़ जाता है।

Question 9. अभिकथन (A) और तर्क (R) आधारित प्रश्न: अभिकथन (A): कवि ईश्वर से अपने जीवन के दुख कम करने की प्रार्थना नहीं करता। तर्क (R): कवि मानता है कि दुख मनुष्य को कमज़ोर बनाते हैं, इसलिए वह दुखों से बचना चाहता है। (क) A और R दोनों सही हैं, और R, A की सही व्याख्या है। (ख) A और R दोनों सही हैं, परंतु R, A की सही व्याख्या नहीं है। (ग) A सही है, परंतु R गलत है। (घ) A गलत है, परंतु R सही है।

Answer: सही उत्तर: (ग) A सही है, परंतु R गलत है। स्पष्टीकरण: अभिकथन (A) सही है कि वह दुख कम करने की याचना नहीं करता। परंतु तर्क (R) गलत है क्योंकि कवि दुखों से बचना नहीं चाहता, बल्कि वह निर्भय होकर उनका सामना करने का आत्मबल माँगता है।

Question 10. कवि की यह प्रार्थना आज के युवा वर्ग के लिए किस प्रकार प्रेरणादायक है? [Value-Based]

Answer: आज का युवा वर्ग छोटी-छोटी असफलताओं, मानसिक तनाव और संघर्षों से घबराकर प्रायः अवसाद (Depression) का शिकार हो जाता है या पलायन कर जाता है। ‘आत्मत्राण’ कविता युवाओं को सिखाती है कि सफलता का मार्ग बाधाओं से होकर ही गुजरता है। युवाओं को संकटों से भागने के बजाय आत्म-विश्वास (Self-belief) और पौरुष के साथ चुनौतियों का डटकर मुकाबला करना चाहिए।

Question 11. इस कविता की भाषा की कोई दो प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।

Answer:

  1. संस्कृतनिष्ठ तत्सम प्रधान शब्दावली: कविता में आत्मत्राण, विपदा, व्यथित, क्षय, वंचना, अनुनय, निखिल जैसे शुद्ध तत्सम शब्दों का अत्यंत प्रवाहमयी और गंभीर प्रयोग हुआ है।
  2. अनुवादात्मक सहजता: यह मूल रूप से बांग्ला भाषा में रचित थी, परंतु आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी ने इसका ऐसा सहज हिंदी अनुवाद किया है कि इसमें प्रार्थना की पवित्रता और ओजस्विता पूर्णतः सुरक्षित है।

Question 12. ‘छिन-छिन में’ शब्द का प्रयोग कवि के किस भाव को पुष्ट करता है?

Answer: ‘छिन-छिन’ (क्षण-क्षण) का अर्थ है—हर पल या लगातार। यह शब्द कवि की अनवरत कृतज्ञता और अनन्य ईश्वरीय स्मरण के भाव को पुष्ट करता है। कवि सुख के दिनों में एक पल के लिए भी अहंकार से ग्रसित होकर ईश्वर को भुलाना नहीं चाहता।

Question 13. केस स्टडी प्रश्न (Case Study Scenario): एक विद्यार्थी बोर्ड परीक्षा से पहले पाठ्यक्रम की अधिकता और समय की कमी के कारण अत्यंत तनाव में है। वह रोज़ मंदिर जाकर ईश्वर से प्रार्थना करता है कि चमत्कार से परीक्षा रद्द हो जाए या पेपर आसान आ जाए। ‘आत्मत्राण’ कविता के आलोक में इस विद्यार्थी के दृष्टिकोण की समीक्षा कीजिए।

Answer: ‘आत्मत्राण’ कविता के अनुसार विद्यार्थी का दृष्टिकोण पूर्णतः पलायनवादी और अकर्मण्य है। वह संकट (परीक्षा) का सामना करने के बजाय उससे भागने (परीक्षा रद्द होने) का चमत्कार माँग रहा है। रवींद्रनाथ ठाकुर के दर्शन के अनुसार, उस विद्यार्थी को ईश्वर से परीक्षा आसान करने की नहीं, बल्कि कठोर परिश्रम करने, ध्यान केंद्रित करने और परीक्षा के मानसिक दबाव को निर्भय होकर सहने की शक्ति (आत्मबल) माँगनी चाहिए।

Question 14. क्या ‘आत्मत्राण’ को एक ‘कर्मवादी प्रार्थना’ कहना उचित होगा?

Answer: हाँ, यह पूर्णतः उचित है। यह एक शुद्ध ‘कर्मवादी प्रार्थना’ (Action-oriented prayer) है। इसमें अकर्मण्यता या भाग्य के भरोसे बैठने का कोई स्थान नहीं है। कवि ईश्वर को एक सहायक ऊर्जा-स्रोत मानता है जो उसके भीतर आत्मबल भरता है, परंतु उस ऊर्जा के माध्यम से संघर्ष (कर्म) स्वयं व्यक्ति को ही करना पड़ता है।

Question 15. इस कविता से आपको क्या शाश्वत नैतिक संदेश मिलता है?

Answer: इस कविता से हमें यह शाश्वत नैतिक संदेश मिलता है कि हमें कभी भी परिस्थितियों के सामने आत्मसमर्पण नहीं करना चाहिए। जीवन में चाहे कितनी भी हानि, धोखा या कष्ट क्यों न मिले, हमें अपनी मानसिक दृढ़ता और सकारात्मकता को खोने नहीं देना चाहिए तथा अपने कर्म और ईश्वर दोनों पर अडिग विश्वास रखना चाहिए।

6. CONCLUDING BOARD TOPPER STRATEGY

सीबीएसई कक्षा 10 हिंदी ‘ब’ की बोर्ड परीक्षा में ‘आत्मत्राण’ अध्याय से शत-प्रतिशत अंक (Full Marks) सुनिश्चित करने के लिए निम्नलिखित रणनीति अपनाएँ:

  1. पारिभाषिक शब्दों का अनिवार्य प्रयोग: उत्तर लिखते समय ‘पलायनवाद’, ‘कर्मण्यता’, ‘आत्मबल’, ‘स्वावलंबन’ और ‘समभाव’ जैसे पारिभाषिक शब्दों का प्रयोग अनिवार्य रूप से करें और उन्हें रेखांकित (Underline) करें। यह परीक्षक को आपकी दार्शनिक समझ का प्रमाण देता है।
  2. नकारात्मकता से बचें: उत्तर में स्पष्ट करें कि कवि का ईश्वर पर ‘अविश्वास’ नहीं है, बल्कि वह अपनी शक्ति का परीक्षण करना चाहता है। यह एक अत्यंत सूक्ष्म परंतु महत्त्वपूर्ण बिंदु है।
  3. प्रस्तुतीकरण (Presentation): दीर्घ उत्तरीय प्रश्नों में पैराग्राफ बदलकर उत्तर लिखें। जब भी पारंपरिक प्रार्थना और इस प्रार्थना में अंतर पूछा जाए, तो दोनों के बीच स्पष्ट तुलनात्मक बिंदु (जैसे- एक में मुक्ति की माँग, दूसरे में शक्ति की माँग) प्रस्तुत करें।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top