Class 10 Hindi स्पर्श पाठ 11 Notes: तीसरी कसम के शिल्पकार शैलेंद्र (2026-2027)

NCERT Solutions & Master Notes for Class 10 Hindi स्पर्श (भाग-2) गद्य खंड पाठ 11: तीसरी कसम के शिल्पकार शैलेंद्र (प्रह्लाद अग्रवाल) (2026-2027)

1. SEO STRATEGY INTRODUCTION & CHAPTER MASTER OVERVIEW

प्रसिद्ध सिनेमा समीक्षक और लेखक प्रह्लाद अग्रवाल द्वारा रचित संस्मरणात्मक निबंध ‘तीसरी कसम के शिल्पकार शैलेंद्र’ केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) की कक्षा 10 हिंदी पाठ्यक्रम ‘ब’ (Course B) की पाठ्यपुस्तक ‘स्पर्श भाग-2’ के गद्य-खंड का एक अत्यंत कलात्मक, संवेदनशील और प्रेरणादायी अध्याय है। बोर्ड परीक्षा के दृष्टिकोण से यह पाठ व्यावसायिकता बनाम कलात्मक शुचिता, गीतकार शैलेंद्र की संवेदनशीलता एवं जीवन-दर्शन, सिनेमा और साहित्य का अंतर्संबंध, तथा पात्रों के सूक्ष्म मानवीय अंतर्द्वंद्व से जुड़े विश्लेषणात्मक व उच्च-स्तरीय चिंतन कौशल (HOTS) आधारित प्रश्नों के लिए प्रतिवर्ष 5 से 8 अंकों का अनिवार्य भारांक (Weightage) रखता है।

यह पाठ हिंदी के महान जनवादी कवि एवं प्रख्यात गीतकार शैलेंद्र (शंकरदास केसरीलाल शैलेंद्र) द्वारा निर्मित एकमात्र कालजयी फीचर फिल्म ‘तीसरी कसम’ (उर्फ ‘मारे गए गुलफाम’, जो सुप्रसिद्ध कथाकार फणीश्वरनाथ रेणु की अमर आंचलिक कहानी पर आधारित थी) के निर्माण-संघर्ष और उसके कलात्मक मूल्यों का प्रामाणिक दस्तावेज़ है। शैलेंद्र ने इस फिल्म का निर्माण किसी व्यावसायिक लाभ, बॉक्स ऑफिस की अंधाधुंध कमाई या धन बटोरने के लिए नहीं किया था, बल्कि उनका उद्देश्य साहित्यिक कहानी की माटी की महक, देहाती सादगी और शुद्ध मानवीय करुणा को सिनेमा के पर्दे पर जीवंत करना था। उस दौर के सबसे बड़े सुपरस्टार अभिनेता राजकपूर और विख्यात अभिनेत्री वहीदा रहमान के होते हुए भी, शैलेंद्र ने फिल्म में किसी प्रकार का सस्ता व्यावसायिक मसाला नहीं जोड़ा।

लेखक ने स्पष्ट किया है कि शैलेंद्र एक आदर्शवादी कवि-हृदय थे, जिन्होंने सिनेमा के बाज़ारू दबावों के आगे कभी घुटने नहीं टेके। यद्यपि तत्कालीन फिल्म वितरकों (डिस्ट्रीब्यूटर्स) की संकीर्ण और मुनाफाखोर मानसिकता के कारण यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर तुरंत भारी धन नहीं कमा सकी, परंतु इसने भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन द्वारा प्रदान किए जाने वाले सर्वोच्च राष्ट्रीय सिनेमाई सम्मान ‘राष्ट्रपति स्वर्ण पदक’ (National Award for Best Feature Film) सहित अनेक अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार जीतकर इतिहास रच दिया।

बोर्ड परीक्षा में शत-प्रतिशत अंक प्राप्त करने के लिए विद्यार्थियों को उत्तर-पुस्तिका में ‘सैल्यूलाइड पर लिखी कविता’, ‘अपरिष्कृत ग्रामीण संवेदना’, ‘दुखांत की गरिमा’, ‘कलात्मक सत्य’, ‘व्यावसायिकता का विरोध’, तथा ‘व्यथा द्वारा अंतःकरण का परिष्कार’ जैसे मानक पारिभाषिक शब्दों और कीवर्ड्स का अनिवार्य रूप से प्रयोग और रेखांकन (Underline) करना चाहिए।

मास्टर सारांश सारणी: ‘तीसरी कसम के शिल्पकार शैलेंद्र’ के प्रमुख स्तंभ एवं फिल्म-दर्शन

तुलनात्मक व वैचारिक आयामशैलेंद्र का दृष्टिकोण एवं फिल्म का स्वरूपव्यावसायिक सिनेमा और वितरकों की संकीर्ण सोच
फिल्म निर्माण का मूल उद्देश्यशुद्ध साहित्यिक, कलात्मक एवं आत्म-अभिव्यक्ति की संवेदना को जीवंत करना।बॉक्स ऑफिस पर अंधाधुंध मुनाफा कमाना, टिकट-खिड़की की बिक्री बढ़ाना।
कथानक का चयन एवं परिवेशफणीश्वरनाथ रेणु की आंचलिक कहानी ‘मारे गए गुलफाम’; विशुद्ध देहाती व ग्रामीण यथार्थ।शहरी चकाचौंध, अवास्तविक भव्यता और कृत्रिम काल्पनिक कहानियों की भरमार।
चरित्र-चित्रण (नायक-नायिका)गाड़ीवान हीरामन की अबोध मासूमियत और नौटंकी नर्तकी हीराबाई की गरिमामयी शालीनता।ग्लैमरस, अस्वाभाविक, आक्रामक और अति-नाटकीय फिल्मी नायक-नायिका।
संगीत एवं गीतों की आत्माबिहार की लोक-धुनों, महुआ घटवारिन के गीतों और गहरे जीवन-दर्शन से युक्त शांत संगीत।तीव्र, कर्णकटु, उथला, उत्तेजक और व्यावसायिक तड़क-भड़क वाला पश्चिमी संगीत।
कहानी का अंत (चरमोत्कर्ष)वियोग और मौन व्यथा का यथार्थवादी, अत्यंत शांत और गरिमामयी दुखांत (Sad Ending)।जबरन थोपा गया अस्वाभाविक सुखद अंत (Happy Ending) और नाटकीय मोड़।
समीक्षात्मक व ऐतिहासिक परिणामराष्ट्रपति स्वर्ण पदक (National Award) से सम्मानित; भारतीय सिनेमा की ऐतिहासिक धरोहर।वितरकों द्वारा प्रचार न करना; तत्कालीन रूप से फिल्म का धीमा व्यावसायिक प्रदर्शन।

2. विस्तृत पाठ सारांश एवं विश्लेषणात्मक व्याख्या (DETAILED CHAPTER SUMMARY)

(क) ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: शैलेंद्र का परिचय और फिल्म निर्माण का संकल्प

शंकरदास केसरीलाल ‘शैलेंद्र’ हिंदी सिनेमा के सर्वाधिक लोकप्रिय, भावुक और प्रगतिशील गीतकार थे। वे मूलतः इप्टा (IPTA – इंडियन पीपुल्स थियेटर एसोसिएशन) से जुड़े हुए एक जनवादी कवि थे, जिनकी लेखनी में आम जनता के संघर्षों, सामाजिक न्याय, प्रेम की शुचिता और करुणा का अपूर्व प्रवाह था। राजकपूर की अनेक प्रसिद्ध फिल्मों (जैसे—आवारा, श्री 420, संगम) के गीत लिखकर उन्होंने राजकपूर के अव्यक्त भावों और उनके अभिनय को अमर संगीत प्रदान किया था।

शैलेंद्र ने जब महान हिंदी कथाकार फणीश्वरनाथ रेणु की प्रसिद्ध आंचलिक कहानी ‘मारे गए गुलफाम’ पढ़ी, तो वे उसके भीतर छिपे विशुद्ध ग्रामीण यथार्थ, बिहार के देहाती जीवन की सोंधी सुगंध, और गाड़ीवान हीरामन के निष्कपट प्रेम पर पूरी तरह मुग्ध हो गए। उन्होंने इस कहानी पर फिल्म बनाने का दृढ़ संकल्प लिया और उसका नाम ‘तीसरी कसम’ (उर्फ ‘मारे गए गुलफाम’) रखा। शैलेंद्र फिल्म निर्माता बनकर कोई धन-कुबेर नहीं बनना चाहते थे; यह फिल्म उनके लिए अपने आंतरिक कलात्मक सत्य और साहित्यिक सौंदर्य को दृश्य-पटल (सैल्यूलाइड) पर साकार करने का एक पावन यज्ञ थी।

(ख) राजकपूर से संवाद और अग्रिम पारिश्रमिक का परिहास

जब शैलेंद्र ने अपने परम मित्र और उस दौर में ‘एशिया के सबसे बड़े शोमैन’ कहे जाने वाले महान अभिनेता राजकपूर को ‘तीसरी कसम’ की कहानी सुनाई, तो राजकपूर कहानी के भावनात्मक प्रभाव से अत्यधिक प्रभावित हुए। उन्होंने तुरंत नायक (गाड़ीवान हीरामन) की भूमिका निभाने के लिए सहर्ष सहमति दे दी।

परंतु इसके साथ ही राजकपूर ने हँसते हुए अत्यंत आत्मीय और मित्रवत परिहास (मज़ाक) में कहा—”कहानी बहुत सुंदर है, पर मेरा पारिश्रमिक (Advance) पहले जमा करवाओ।” राजकपूर जानते थे कि शैलेंद्र एक भावुक, निश्छल और आदर्शवादी कवि हैं, जिन्हें व्यावसायिक बाज़ार, फिल्म-निर्माण की जटिलताओं और घाटे-मुनाफे के कड़वे यथार्थ का कोई व्यावहारिक ज्ञान नहीं है। राजकपूर का यह कथन वस्तुतः एक चेतावनी थी कि फिल्म निर्माण केवल भावनाओं का नहीं, बल्कि एक भारी जोखिम भरा आर्थिक व्यवसाय है।

(ग) फिल्म की कलात्मकता: ‘सैल्यूलाइड पर लिखी कविता’

‘तीसरी कसम’ का निर्माण भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक अनूठी मिसाल बन गया। लेखक प्रह्लाद अग्रवाल ने इस फिल्म को ‘सैल्यूलाइड (सिनेमा के पर्दे) पर लिखी गई एक विशुद्ध कविता’ कहा है। फिल्म की प्रमुख कलात्मक विशेषताएँ निम्नलिखित थीं:

  • राजकपूर का अप्रतिम अभिनय: राजकपूर ने अपनी ‘शोमैन’ और स्टारडम की भव्य छवि को पूरी तरह भुला दिया। उन्होंने धोती-कुर्ता पहनकर, देहाती गाड़ीवान हीरामन के भोलेपन, उसकी संकोची मुस्कान और निष्कपट आँखों के भावों को इस प्रकार पर्दे पर उतारा कि दर्शक भूल गए कि वे राजकपूर को देख रहे हैं; उन्हें केवल ‘हीरामन’ दिखाई दिया।
  • हीराबाई की गरिमा: प्रसिद्ध अभिनेत्री वहीदा रहमान ने नौटंकी नर्तकी ‘हीराबाई’ के रूप में अपनी कला का सर्वोच्च प्रदर्शन किया। उन्होंने एक लोक-नर्तकी के भीतर छिपी स्त्री-सुलभ मर्यादा, शालीनता और हीरामन के प्रति उपजे पवित्र वात्सल्य को अपनी आँखों से जीवंत किया।
  • माटी की गंध और लोक-संस्कृति: फिल्म में बिहार के ग्रामीण मेलों, बैलगाड़ियों के पहियों की चरमराहट, महुआ घटवारिन के लोक-आख्यानों और लोक-धुनों का ऐसा अकृत्रिम चित्रण था, जिसने दर्शकों को सीधे गाँव की मिट्टी से जोड़ दिया।
  • संगीत का दार्शनिक आधार: संगीतकार जोड़ी शंकर-जयकिशन और गायक मुकेश के साथ मिलकर शैलेंद्र ने ऐसे अमर गीत रचे जो सरल शब्दों में जीवन का गूढ़ सत्य कहते थे (जैसे—“सजन रे झूठ मत बोलो, खुदा के पास जाना है” तथा “सजनवा बैरी हो गए हमार” )।

(घ) वितरकों की संकीर्णता और फिल्म की तात्कालिक व्यावसायिक असफलता

फिल्म बनकर तैयार हुई तो कला-समीक्षकों ने इसे भारतीय सिनेमा का मील का पत्थर घोषित किया। परंतु तत्कालीन सिनेमाई बाज़ार और फिल्म वितरकों (डिस्ट्रीब्यूटर्स) ने इसे पूरी तरह उपेक्षित कर दिया। लेखक ने वितरकों को ‘आँखों पर चश्मा चढ़ाए केवल मुनाफे की भाषा समझने वाले अंधे व्यापारी’ कहा है।

वितरकों को फिल्म में कोई तेज-तर्रार मारधाड़, सस्ते फूहड़ चुटकुले या भड़कीले नाच-गाने नहीं मिले। वे इस शांत और साहित्यिक फिल्म के मर्म को समझने में पूरी तरह अक्षम थे। उन्होंने फिल्म का उचित प्रचार-प्रसार नहीं किया और न ही इसे प्रमुख सिनेमाघरों में सही ढंग से प्रदर्शित किया। इसके अतिरिक्त, फिल्म का अंत कोई जबरन थोपा गया मिलन (Happy Ending) नहीं था, बल्कि हीरामन और हीराबाई के बिछोह का एक अत्यंत शांत, गरिमामयी और कारुणिक दुखांत (Sad Ending) था। आम दर्शक उस समय केवल मसाला फिल्मों के आदी थे, जिसके कारण ‘तीसरी कसम’ को बॉक्स ऑफिस पर अपेक्षित तात्कालिक व्यावसायिक सफलता नहीं मिल सकी।

(ङ) राष्ट्रीय पुरस्कार, शैलेंद्र की व्यथा और अमर अवदान

फिल्म के व्यावसायिक तनाव और आर्थिक संकट ने संवेदनशील शैलेंद्र के स्वास्थ्य को भीतर तक तोड़ दिया। मात्र 43 वर्ष की अल्पायु में ही हिंदी साहित्य और सिनेमा का यह महान शिल्पी इस संसार से विदा हो गया। शैलेंद्र की मृत्यु पर राजकपूर ने रोते हुए कहा था कि “मैंने अपना दाहिना हाथ, अपनी आत्मा और अपनी भावनाओं को शब्द देने वाला सच्चा मित्र खो दिया है।”

यद्यपि शैलेंद्र अपने जीवनकाल में अपनी इस महान कृति का पूर्ण गौरव नहीं देख सके, परंतु मरणोपरांत ‘तीसरी कसम’ को तत्कालीन राष्ट्रपति द्वारा ‘राष्ट्रपति स्वर्ण पदक’ (सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार) प्रदान किया गया। इसके अतिरिक्त, फिल्म को ‘बंगाल फिल्म जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन’ (BFJA) द्वारा सर्वश्रेष्ठ फिल्म, सर्वश्रेष्ठ अभिनेता और सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के पुरस्कारों से नवाजा गया। शैलेंद्र की यह फिल्म आज भी विश्व सिनेमा में साहित्य और कला के सच्चे समन्वय का सर्वोच्च प्रतिमान मानी जाती है।

3. NCERT पाठ्यपुस्तक अभ्यास: प्रश्न एवं संपूर्ण आदर्श उत्तर

(क) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर (25-30 शब्दों में) दीजिए:

Question 1. ‘तीसरी कसम’ फ़िल्म को कौन-कौन से पुरस्कारों से सम्मानित किया गया? (Page No. 80) [CBSE 2019, 2023]

Answer:

‘तीसरी कसम’ फ़िल्म को तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन द्वारा भारतीय सिनेमा के सर्वोच्च राष्ट्रीय सम्मान ‘राष्ट्रपति स्वर्ण पदक’ (National Award for Best Feature Film) से सम्मानित किया गया।

इसके अतिरिक्त, फ़िल्म को बंगाल फ़िल्म जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन (BFJA) द्वारा ‘सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म’, ‘सर्वश्रेष्ठ अभिनेता’ (राजकपूर), ‘सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री’ (वहीदा रहमान) तथा विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कारों से नवाजा गया।

Question 2. शैलेंद्र ने राजकपूर की भावनाओं को शब्द दिए हैं—इस कथन से आप क्या समझते हैं? स्पष्ट कीजिए। (Page No. 80) [CBSE 2020, 2024]

Answer:

राजकपूर एक महान और संवेदनशील अभिनेता थे, जिनके मन में दृश्यों और भावों की अथाह तरंगे तैरती थीं, परंतु वे स्वयं कवि नहीं थे।

गीतकार शैलेंद्र राजकपूर के अंतर्मन की सूक्ष्म अनुभूतियों, आँखों के इशारों, चेहरे की मुस्कान और उनके अव्यक्त दर्द को पहचानकर उन्हें अत्यंत सरल, सुमधुर और कालजयी गीतों में ढाल देते थे। ‘आवारा हूँ’, ‘प्यार हुआ इकरार हुआ’ और ‘सजन रे झूठ मत बोलो’ जैसे गीत इसी अद्भुत भावनात्मक तादात्म्य के साक्षात प्रमाण हैं।

Question 3. लेखक ने राजकपूर को ‘एशिया का सबसे बड़ा शोमैन’ कहा है। शोमैन से क्या तात्पर्य है? (Page No. 80)

Answer:

‘शोमैन’ (Showman) का तात्पर्य ऐसे अद्वितीय कलाकार, निर्देशक या फ़िल्म-निर्माता से है, जो भव्य, कलात्मक, अत्यधिक मनोरंजक और बड़े पैमाने के दृश्यों को सिनेमा के पर्दे पर प्रस्तुत करने में असाधारण महारत रखता हो।

राजकपूर अपनी फ़िल्मों में भव्य सेट्स, मनमोहक संगीत और जनमानस को बाँधने वाले प्रस्तुतीकरण के कारण पूरे एशिया में ‘द ग्रेट शोमैन’ के नाम से विख्यात थे।

Question 4. फ़िल्म ‘तीसरी कसम’ के नायक और नायिका का क्या नाम है? फ़िल्म में इन पात्रों का अभिनय किन कलाकारों ने किया है? (Page No. 80)

Answer:

  • नायक: पात्र का नाम हीरामन (एक भोला-भाला देहाती गाड़ीवान) है, जिसका अमर और भावपूर्ण अभिनय महान अभिनेता राजकपूर ने किया था।
  • नायिका: पात्र का नाम हीराबाई (मथुरा की नौटंकी कलाकार/नर्तकी) है, जिसका अत्यंत शालीन और संवेदनशील अभिनय प्रसिद्ध अभिनेत्री वहीदा रहमान ने किया था।

Question 5. ‘तीसरी कसम’ फ़िल्म को ‘सैल्यूलाइड पर लिखी कविता’ क्यों कहा गया है? (Page No. 80) [BOARD EXAM FAVORITE / CBSE 2022]

Answer:

‘सैल्यूलाइड’ (सिनेमा की रील) पर बनी यह फ़िल्म किसी साधारण व्यावसायिक सिनेमा की तरह नहीं, बल्कि एक शुद्ध, कोमल, छंदबद्ध और भावपूर्ण कविता की भाँति पर्दे पर प्रवाहित होती है।

इसमें बाज़ारू मसाला, फूहड़ता और बनावटी ड्रामा नहीं है; बल्कि फणीश्वरनाथ रेणु की मूल साहित्यिक कहानी की माटी की महक, देहाती सादगी, प्रेम की निश्छलता और विरह के मौन दर्द को शैलेंद्र ने कैमरे के माध्यम से कविता की तरह ही सजीव किया है।

(ख) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर (50-60 शब्दों में) दीजिए:

Question 6. शैलेंद्र ने ‘तीसरी कसम’ फ़िल्म बनाने के लिए फणीश्वरनाथ रेणु की किस अमर कहानी का चयन किया था? कहानी के कौन-से पहलू शैलेंद्र को आकर्षित कर सके? (Page No. 80) [CBSE 2021]

Answer:

शैलेंद्र ने फ़िल्म निर्माण के लिए फणीश्वरनाथ रेणु की प्रसिद्ध आंचलिक कहानी ‘मारे गए गुलफाम’ का चयन किया था।

आकर्षित करने वाले मुख्य पहलू:

  • माटी की विशुद्ध आंचलिक गंध: कहानी में बिहार के ग्रामीण परिवेश, बैलगाड़ियों, ग्रामीण मेलों और देहाती लोक-संस्कृति का अत्यंत यथार्थवादी चित्रण था।
  • निर्मल और अबोध प्रेम: गाड़ीवान हीरामन की बाल-सुलभ मासूमियत और नौटंकी नर्तकी हीराबाई के प्रति उसका वासना-रहित, अत्यंत आदरपूर्ण और निस्वार्थ प्रेम।
  • मूक करुणा और विरह का यथार्थ: कहानी में शब्दों के स्थान पर मौन आँखों और आंतरिक व्यथा का ऐसा गरिमामयी संगम था, जिसने शैलेंद्र के संवेदनशील कवि-हृदय को भीतर तक स्पर्श कर लिया।

Question 7. राजकपूर ने ‘तीसरी कसम’ की कहानी सुनने के बाद शैलेंद्र से क्या कहा और इसका क्या अर्थ था? (Page No. 80) [CBSE 2020, 2023]

Answer:

कहानी सुनने के बाद राजकपूर ने भावुक होकर शैलेंद्र की प्रशंसा की और हँसते हुए कहा—”कहानी बहुत अच्छी है, पर मेरा पारिश्रमिक (Advance) पहले जमा करवाओ।”

अर्थ एवं निहितार्थ:

यह राजकपूर का एक मित्रवत, स्नेहपूर्ण और आत्मीय परिहास (मज़ाक) था। राजकपूर भली-भाँति जानते थे कि शैलेंद्र एक भावुक, निश्छल और आदर्शवादी कवि हैं, जिन्हें व्यावसायिक बाज़ार और फिल्म-निर्माण के कड़वे आर्थिक यथार्थ का कोई अनुभव नहीं है।

राजकपूर शैलेंद्र को परोक्ष रूप से सचेत करना चाहते थे कि फ़िल्म-निर्माण एक अत्यंत जोखिम भरा, खर्चीला और व्यावसायिक क्षेत्र है, जहाँ केवल भावनाओं के सहारे उतरना भारी आर्थिक संकट का कारण बन सकता है।

Question 8. ‘तीसरी कसम’ फ़िल्म की असफलता के क्या मुख्य कारण थे? (Page No. 80) [CBSE 2018, 2024 HOTS]

Answer:

फ़िल्म समीक्षकों द्वारा अत्यधिक सराहे जाने के बावजूद, तत्कालीन बॉक्स ऑफिस पर ‘तीसरी कसम’ को अपेक्षित व्यावसायिक सफलता नहीं मिल सकी। इसके मुख्य कारण निम्नलिखित थे:

  • वितरकों (डिस्ट्रीब्यूटर्स) की संकीर्ण मानसिकता: वितरक केवल नाच-गाने, तेज मारधाड़ और मसालेदार फ़िल्मों को ही बिकने योग्य माल समझते थे। वे इस शांत, गंभीर और साहित्यिक फ़िल्म के मर्म को न समझ सके और उन्होंने फ़िल्म का उचित प्रचार-प्रसार नहीं किया।
  • व्यावसायिक फार्मूलों का अभाव: फ़िल्म में कोई भड़कीला एक्शन, अस्वाभाविक ड्रामा या द्विअर्थी संवाद नहीं थे।
  • दुखांत (Sad Ending): आम दर्शक उस समय फ़िल्मों में जबरन थोपा गया सुखद अंत (Happy Ending) देखने के आदी थे, जबकि ‘तीसरी कसम’ का अंत हीरामन और हीराबाई के विछोह का अत्यंत शांत और मार्मिक दुखांत था।

Question 9. शैलेंद्र के गीतों की क्या विशेषताएँ थीं? पाठ के आधार पर स्पष्ट कीजिए। (Page No. 80) [CBSE 2022, 2023]

Answer:

शैलेंद्र हिंदी सिनेमा के सर्वाधिक संवेदनशील, जनप्रिय और दार्शनिक गीतकार थे। उनके गीतों की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

  • सरलता में अगाध दार्शनिक गहराई: उनके गीत बाहर से अत्यंत सरल, सुबोध और कर्णप्रिय लगते थे, परंतु उनके भीतर गहरा जीवन-दर्शन और सामाजिक सत्य छिपा होता था (उदा. “सजन रे झूठ मत बोलो, खुदा के पास जाना है” )।
  • लोक-संवेदना और माटी की मिठास: उन्होंने कठिन शास्त्रीय बंधनों के स्थान पर आम जनमानस की लोक-भाषा, लोक-धुनों और देहाती गीतों की मिठास को अपनाया।
  • मानवीय गरिमा और करुणा की प्रतिष्ठा: उनके गीतों में आशावादिता, मानवीय संवेदना, करुणा और सच्चे प्रेम का आदर झलकता था।
  • कवित्व की शुचिता: उन्होंने कभी भी सस्ते, अशालीन या व्यावसायिक रूप से उथले शब्दों का प्रयोग नहीं किया।

4. भाव एवं आशय स्पष्टीकरण (दीर्घ उत्तरीय प्रश्न)

Question 10. निम्नलिखित पंक्तियों का आशय स्पष्ट कीजिए:

(क) शैलेंद्र ने फ़िल्म को व्यावसायिक लाभ का साधन नहीं, बल्कि आत्म-अभिव्यक्ति का माध्यम माना था। (Page No. 80)

Answer:

आशय: शैलेंद्र मूल रूप से एक आदर्शवादी जनकवि थे, कोई मुनाफाखोर व्यापारी नहीं। अधिकांश फ़िल्म-निर्माता फ़िल्मों का निर्माण केवल अपनी तिजोरियाँ भरने और भारी मुनाफा कमाने के लिए करते हैं।

परंतु शैलेंद्र के लिए ‘तीसरी कसम’ का निर्माण अपने आंतरिक कलात्मक सत्य, साहित्यिक सौंदर्य और मानवीय संवेदना को दृश्य-पटल पर साकार करने का एक पावन अनुष्ठान था। उन्होंने धन कमाने के लिए फ़िल्म में किसी भी प्रकार का सस्ता व्यावसायिक समझौता करने या कहानी की मूल आत्मा को बदलने से साफ इनकार कर दिया।

(ख) व्यथा आदमी को पराजित नहीं करती, उसे माँजती है। (Page No. 80) [BOARD EXAM FAVORITE / CBSE 2023 HOTS]

Answer:

आशय: यह शैलेंद्र के संपूर्ण जीवन, साहित्य और काव्य-दर्शन का मूल मंत्र है। शैलेंद्र का यह दृढ़ विश्वास था कि जीवन में आने वाले दुख, कष्ट, विरह, असफलताएँ और पीड़ाएँ मनुष्य को तोड़ने या निराश करने के लिए नहीं आतीं, बल्कि वे मनुष्य के अंतःकरण को अधिक संवेदनशील, परिपक्व, निर्मल और दृढ़ (माँजने का कार्य) बनाती हैं।

जो व्यक्ति व्यथा को सकारात्मक रूप से सहकर आगे बढ़ता है, उसका चरित्र सोने की तरह तपकर कुंदन बन जाता है और वह जीवन की वास्तविक सच्चाइयों को गहराई से समझ पाता है।

(ग) ‘तीसरी कसम’ त्रासद अनुभूतियों की ऐसी फ़िल्म है, जो दर्शक को रुलाती नहीं, बल्कि उसके भीतर एक गहरी उदासी और आत्मीयता भर देती है। (Page No. 80)

Answer:

आशय: ‘तीसरी कसम’ का वियोग कोई नाटकीय, चीख-पुकार वाला या आँसू बहाने वाला उथला विलाप नहीं है। जब हीराबाई मेला समाप्त होने पर नौटंकी छोड़कर रेलगाड़ी से विदा होती है और हीरामन अपनी खाली बैलगाड़ी लेकर अकेले गाँव की ओर लौटता है, तो दर्शक फफक-फफक कर नहीं रोता।

बल्कि दर्शक के अंतर्मन में एक अत्यंत शांत, गहरी, पवित्र उदासी और दोनों पात्रों के प्रति अगाध आदर व आत्मीयता का संचार होता है। यह कला के उच्चतम साधारणीकरण (Universalization of Emotion) का शिखर है, जहाँ दर्शक पात्रों के मौन दर्द के साथ एकाकार हो जाता है।

5. भाषा अध्ययन एवं व्यावहारिक व्याकरण

Question 11. पाठ में आए निम्नलिखित सामासिक पदों का विग्रह करते हुए समास का भेद लिखिए:

सामासिक पदसमास-विग्रहसमास का भेद
स्वर्ण-पदकस्वर्ण (सोने) का पदकतत्पुरुष समास (संबंध)
गीतकारगीत की रचना करने वालातत्पुरुष (उपपद) समास
आत्म-अभिव्यक्तिआत्मा की (अपनी) अभिव्यक्तितत्पुरुष समास (संबंध)
बैलगाड़ीबैलों द्वारा खींची जाने वाली गाड़ीतत्पुरुष समास (मध्यमपदलोपी)
दुख-दर्ददुख और दर्दद्वंद्व समास
जीवन-दर्शनजीवन का दर्शनतत्पुरुष समास (संबंध)
कला-प्रेमीकला का प्रेमीतत्पुरुष समास (संबंध)
सुख-दुखसुख और दुखद्वंद्व समास

Question 12. पाठ में प्रयुक्त निम्नलिखित विदेशी (अंग्रेज़ी, अरबी, फ़ारसी) और तत्सम शब्दों के मानक हिंदी पर्याय लिखिए:

मूल शब्दशब्द का स्रोत / स्वरूपमानक हिंदी पर्याय
सैल्यूलाइडअंग्रेज़ीफ़िल्म की रील / सिनेमा का पर्दा
शोमैनअंग्रेज़ीभव्य प्रदर्शन करने वाला सिद्धहस्त कलाकार
डिस्ट्रीब्यूटरअंग्रेज़ीफ़िल्म वितरक / प्रसारक व्यापारी
पारिश्रमिकतत्सममेहनत का मूल्य / पारिश्रमिक धन (Advance)
शिद्दतउर्दूगहराई / तीव्रता / अत्यधिक लगन
तराशनाफ़ारसीगढ़ना / निखारना / सँवारना
आंचलिकतत्समकिसी विशेष क्षेत्र या अंचल से संबंधित
मुग्धतत्सममोहित / सम्मोहित / अत्यधिक आकर्षित

6. 15 उच्च-स्तरीय बोर्ड परीक्षा मॉडल प्रश्न (CBSE HOTS, Case Study & FAQs)

Question 1. ‘तीसरी कसम’ शीर्षक की क्या सार्थकता है? गाड़ीवान हीरामन ने अपने जीवन में कौन-सी तीन कसमें खाई थीं? [BOARD FAVORITE / CBSE 2024 HOTS]

Answer:

‘तीसरी कसम’ शीर्षक पूर्णतः सार्थक, सटीक और कथानक की मूल आत्मा को अभिव्यक्त करने वाला है। गाड़ीवान हीरामन ने अपने जीवन के कड़वे और भावनात्मक अनुभवों से निम्नलिखित तीन कसमें खाई थीं:

  1. पहली कसम: कभी भी चोरी का माल (तस्करी का सामान) अपनी बैलगाड़ी में नहीं लादेगा (पुलिस से बचने के बाद खाई गई कसम)।
  2. दूसरी कसम: कभी भी बाँस जैसी खतरनाक वस्तु गाड़ी में नहीं ढोएगा (गाड़ी के दुर्घटनाग्रस्त होने के बाद खाई गई कसम)।
  3. तीसरी कसम: कभी भी कंपनी की औरत (नौटंकी की नर्तकी) को अपनी गाड़ी में नहीं बैठाएगा (हीराबाई के वियोग और उससे हुए विछोह के गहरे दर्द के बाद खाई गई अंतिम कसम)।यह शीर्षक हीरामन के जीवन-संघर्ष और उसके पवित्र प्रेम की करुण त्रासदी को रेखांकित करता है।

Question 2. शैलेंद्र का पूरा नाम क्या था और वे किस साहित्यिक व सांस्कृतिक आंदोलन के कवि थे?

Answer:

शैलेंद्र का वास्तविक नाम शंकरदास केसरीलाल शैलेंद्र था। वे मूल रूप से प्रगतिशील (मार्क्सवादी/जनवादी) विचारधारा के कवि थे। वे ‘इप्टा’ (IPTA – इंडियन पीपुल्स थियेटर एसोसिएशन) से गहराई से जुड़े हुए थे। उनके गीतों में शोषित वर्ग की व्यथा, सामाजिक न्याय, मानवीय समानता और करुणा की तीव्र गूँज विद्यमान थी।

Question 3. राजकपूर ने ‘तीसरी कसम’ में हीरामन के चरित्र को किस प्रकार जीवंत किया?

Answer:

राजकपूर ने अपने ‘एशिया के सबसे बड़े शोमैन’ और स्टारडम की भव्य छवि को पूरी तरह त्याग दिया। उन्होंने धोती-कुर्ता पहनकर, देहाती बोली बोलकर और अपनी आँखों में एक सीधे-सादे, निश्चल, संकोची व भावुक ग्रामीण गाड़ीवान की मासूमियत को ऐसा जीवंत किया कि दर्शक भूल गए कि वे राजकपूर को देख रहे हैं; उन्हें केवल ‘हीरामन’ दिखाई दिया।

Question 4. शैलेंद्र को ‘कवि-हृदय’ क्यों कहा गया है, जबकि वे एक सफल व्यावसायिक गीतकार भी थे? [CBSE 2023]

Answer:

व्यावसायिक सिनेमा में कार्यरत रहकर भी शैलेंद्र ने कभी अपने कवि-मन की पवित्रता, ईमानदारी और सामाजिक सरोकारों को नहीं बेचा। उन्होंने कभी भी तुकबंदी वाले उथले, अशालीन या द्विअर्थी गीत नहीं लिखे। उनके प्रत्येक फ़िल्मी गीत में एक शुद्ध कविता जैसी आत्मा, साहित्यिक गरिमा और उच्च मानवीय मूल्य विद्यमान थे।

Question 5. फ़िल्म के वितरकों (डिस्ट्रीब्यूटर्स) को लेखक ने ‘आँखों पर चश्मा चढ़ाए व्यापारी’ क्यों कहा है?

Answer:

क्योंकि वितरकों की दृष्टि केवल तात्कालिक मुनाफे, टिकट-खिड़की की कमाई और व्यावसायिक मसालों तक सीमित थी। वे कला की परख, मानवीय संवेदना और साहित्यिक सौंदर्य को देखने में सर्वथा असमर्थ (अंधे) थे। वे समझ ही नहीं पाए कि ‘तीसरी कसम’ जैसी शांत और उत्कृष्ट फ़िल्म भारतीय सिनेमा की एक ऐतिहासिक धरोहर थी।

Question 6. हीराबाई के चरित्र की कौन-सी बात हीरामन को सबसे अधिक प्रभावित करती है?

Answer:

हीराबाई नौटंकी की नर्तकी होने के बावजूद अत्यंत शालीन, स्नेहमयी और हीरामन को ‘मीता’ कहकर आदर देने वाली स्त्री थी। उसने हीरामन के भोलेपन का कभी मज़ाक नहीं उड़ाया, बल्कि उसके प्रति एक निस्वार्थ वात्सल्य और अपनत्व का भाव रखा, जिसने हीरामन के मन में उसके लिए एक देवी जैसा आदरणीय स्थान बना दिया।

Question 7. ‘सजन रे झूठ मत बोलो’ गीत में शैलेंद्र का कौन-सा दार्शनिक चिंतन प्रकट होता है? [CBSE 2022]

Answer:

इस गीत में कबीरकालीन निर्गुण दर्शन, जीवन की नश्वरता, मृत्यु की अकाट्यता, और नैतिक शुचिता का चिंतन प्रकट होता है। यह गीत मनुष्य को सांसारिक माया-मोह, छल-कपट और असत्य से दूर रहकर ईश्वर और अपनी आत्मा के प्रति सत्यनिष्ठ व विनम्र रहने की शाश्वत प्रेरणा देता है।

Question 8. मुकेश की आवाज़ और शैलेंद्र के गीतों के मध्य क्या संबंध था?

Answer:

गायक मुकेश की दर्दभरी, शांत, सहज और आत्मीय आवाज़ शैलेंद्र के करुण, संवेदनशील और जीवन-दर्शन से भरे गीतों के सर्वथा अनुकूल थी। मुकेश जब शैलेंद्र के शब्दों को गाते थे, तो ऐसा लगता था मानो स्वयं कवि की आत्मा उस स्वर में पिघलकर श्रोताओं के अंतःकरण में उतर रही हो।

Question 9. अभिकथन (A) और तर्क (R) आधारित प्रश्न:

अभिकथन (A): ‘तीसरी कसम’ फ़िल्म तत्कालीन सिनेमाई बाज़ार में तुरंत भारी धन नहीं कमा सकी।

तर्क (R): फ़िल्म में व्यावसायिक मसाले, मारधाड़ और उथले गानों का सर्वथा अभाव था तथा वितरकों ने इसका प्रचार नहीं किया।

(क) A और R दोनों सही हैं, और R, A की सही व्याख्या है।

(ख) A और R दोनों सही हैं, परंतु R, A की सही व्याख्या नहीं है।

(ग) A सही है, परंतु R गलत है।

(घ) A गलत है, परंतु R सही है।

Answer:

सही उत्तर: (क) A और R दोनों सही हैं, और R, A की सही व्याख्या है।

स्पष्टीकरण: फ़िल्म की अत्यधिक सादगी और व्यावसायिक मसालों का न होना ही तत्कालीन वितरकों द्वारा इसे उपेक्षित करने का मुख्य कारण बना।

Question 10. शैलेंद्र की मृत्यु पर राजकपूर और सिने-जगत की क्या प्रतिक्रिया थी?

Answer:

शैलेंद्र की मात्र 43 वर्ष की आयु में असामयिक मृत्यु से राजकपूर भीतर तक टूट गए। उन्होंने विलाप करते हुए कहा कि “मैंने अपना दाहिना हाथ, अपनी आत्मा और अपनी भावनाओं को शब्द देने वाला सच्चा मित्र खो दिया है।” संपूर्ण हिंदी साहित्य और सिनेमा जगत के लिए यह एक अपूरणीय क्षति थी।

Question 11. ‘मारे गए गुलफाम’ कहानी और ‘तीसरी कसम’ फ़िल्म के बीच क्या साम्य है?

Answer:

दोनों की आत्मा पूर्णतः एक है। भाषा की आंचलिक मिठास, देहाती संस्कृति, लोकगीत, हीरामन का भोलापन और हीराबाई की आंतरिक विवशता—इन सभी मूल तत्त्वों को शैलेंद्र ने बिना किसी छेड़छाड़ के हूबहू कैमरे के माध्यम से पर्दे पर जीवंत किया।

Question 12. ‘तीसरी कसम’ में प्रयुक्त संगीत की क्या विशेषता थी?

Answer:

फ़िल्म का संगीत संगीतकार जोड़ी शंकर-जयकिशन ने तैयार किया था। इसकी विशेषता यह थी कि इसमें बिहार की लोक-धुनों, महुआ घटवारिन के गीतों, और देहाती ढोलक-हारमोनियम की मिठास का ऐसा अद्भुत प्रयोग था जो पाश्चात्य ऑर्केस्ट्रा के शोर से कोसों दूर और माटी के अत्यंत करीब था।

Question 13. शैलेंद्र की यह फ़िल्म आज के फ़िल्म-निर्माताओं को क्या संदेश देती है? [Value-Based]

Answer:

यह फ़िल्म संदेश देती है कि सिनेमा केवल पैसा छापने की मशीन नहीं, बल्कि समाज की सांस्कृतिक और मानवीय चेतना को समृद्ध करने का एक सशक्त माध्यम है। कला में सादगी, ईमानदारी और साहित्यिक निष्ठा ही किसी कृति को कालजयी और अमर बनाती है।

Question 14. केस स्टडी प्रश्न (Case Study Scenario):

एक युवा स्वतंत्र फ़िल्मकार एक अत्यंत संवेदनशील और सामाजिक समस्या पर आधारित साहित्यिक फ़िल्म बनाता है। बड़े वितरक फ़िल्म में ‘आइटम नंबर’ और ‘काल्पनिक एक्शन’ जोड़ने का दबाव बनाते हैं, अन्यथा फ़िल्म को सिनेमाघरों में रिलीज़ न करने की धमकी देते हैं।

शैलेंद्र के जीवन और ‘तीसरी कसम’ के संदर्भ में उस युवा फ़िल्मकार को क्या निर्णय लेना चाहिए?

Answer:

उस युवा फ़िल्मकार को शैलेंद्र के आदर्शों पर चलते हुए अपनी कलात्मक शुचिता और कहानी की मूल आत्मा से कोई समझौता नहीं करना चाहिए। शैलेंद्र ने भी वितरकों के दबाव में आकर कभी फ़िल्म में अनावश्यक मसाले नहीं जोड़े। यद्यपि तत्कालीन रूप से आर्थिक कठिनाइयाँ आ सकती हैं, परंतु एक सच्ची और ईमानदार कलाकृति ही इतिहास में अमर होती है, जैसा कि ‘तीसरी कसम’ ने राष्ट्रीय स्वर्ण पदक जीतकर सिद्ध किया।

Question 15. प्रह्लाद अग्रवाल के इस पाठ का मुख्य उद्देश्य क्या है?

Answer:

लेखक का मुख्य उद्देश्य गीतकार शैलेंद्र के अद्वितीय कवि-व्यक्तित्व, उनकी कलात्मक ईमानदारी, उनके निस्वार्थ आदर्शवाद और भारतीय सिनेमा में उनके अप्रतिम अवदान को रेखांकित करना है, ताकि भावी पीढ़ी कला और व्यवसाय के अंतर को भली-भाँति समझ सके।

7. CONCLUDING BOARD TOPPER STRATEGY

सीबीएसई कक्षा 10 हिंदी ‘ब’ की बोर्ड परीक्षा में ‘तीसरी कसम के शिल्पकार शैलेंद्र’ अध्याय से शत-प्रतिशत अंक प्राप्त करने की विशेष परीक्षा रणनीति:

  1. पात्रों और पुरस्कारों के सटीक नाम: उत्तर में ‘हीरामन (राजकपूर)’, ‘हीराबाई (वहीदा रहमान)’, ‘मारे गए गुलफाम (फणीश्वरनाथ रेणु)’, तथा ‘राष्ट्रपति स्वर्ण पदक’ का उल्लेख अवश्य करें और मुख्य शब्दों को रेखांकित (Underline) करें।
  2. कला बनाम व्यवसाय का द्वंद्व: जब भी फ़िल्म की असफलता या शैलेंद्र के दर्शन का प्रश्न आए, तो ‘व्यावसायिकता पर कलात्मक सत्य की विजय’ के बिंदु को केंद्रीय तर्क के रूप में प्रस्तुत करें।
  3. शैलेंद्र के गीतों के उद्धरण: आवश्यकता पड़ने पर शैलेंद्र के प्रसिद्ध गीतों की पंक्तियों (उदा. “सजन रे झूठ मत बोलो…” ) का संदर्भ दें, जो आपके उत्तर को साधारण से उत्कृष्ट (Topper Level) बनाएगा।
  4. भाषा एवं वर्तनी की शुद्धता: ‘सैल्यूलाइड’, ‘शोमैन’, ‘डिस्ट्रीब्यूटर’, ‘पारिश्रमिक’, ‘आंचलिक’ जैसे पारिभाषिक शब्दों की वर्तनी शुद्ध लिखें।

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