NCERT Solutions for Class 10 Hindi स्पर्श (भाग-2) गद्य खंड पाठ 13: पतझर में टूटी पत्तियाँ (रवींद्र केलेकर)
1. SEO STRATEGY INTRODUCTION & CHAPTER MASTER OVERVIEW
प्रसिद्ध कोंकणी व मराठी साहित्यकार तथा ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित रवींद्र केलेकर द्वारा रचित ‘पतझर में टूटी पत्तियाँ’ सीबीएसई (CBSE) कक्षा 10 हिंदी पाठ्यक्रम ‘ब’ (Course B) की पाठ्यपुस्तक ‘स्पर्श भाग-2’ के गद्य-खंड का अत्यंत विचारोत्तेजक और दार्शनिक निबंध-द्वय है। यह पाठ दो प्रेरक प्रसंगों में विभाजित है: (I) गिन्नी का सोना और (II) झेन की देन। बोर्ड परीक्षाओं के दृष्टिकोण से इस पाठ से व्यावहारिकता बनाम आदर्शवाद, मानसिक तनाव व आधुनिक जीवन की अंधी दौड़, झेन परंपरा और टी-सेरेमनी (चा-नो-यू), तथा वर्तमान क्षण में जीने (Living in the Present) से जुड़े विश्लेषणात्मक व मूल्यपरक प्रश्न अनिवार्य रूप से पूछे जाते हैं।
प्रथम प्रसंग ‘गिन्नी का सोना’ में लेखक ने शुद्ध सोने (शुद्ध आदर्श) और गिन्नी के सोने (व्यावहारिकता युक्त मिलावटी सोना) के माध्यम से समाज के नैतिक मूल्यों का विश्लेषण किया है। शुद्ध सोना 100% खरा होता है, परंतु उसमें थोड़ा ताँबा मिलाने पर ही वह ‘गिन्नी का सोना’ बनकर आभूषण बनाने योग्य चमक पाता है। समाज में शुद्ध आदर्शवादी लोग (गांधी जी जैसे महापुरुष) समाज को शाश्वत दिशा देते हैं, जबकि केवल स्वार्थी ‘प्रैक्टिकल आइडियलिस्ट’ आदर्शों को अपनी सुविधा के अनुसार गिरा देते हैं।
द्वितीय प्रसंग ‘झेन की देन’ में लेखक ने जापान की तेज रफ्तार जिंदगी, अमेरिका से अंधी आर्थिक प्रतिस्पर्धा और उसके कारण जापान के 80% लोगों के मनोरोगी होने की समस्या को उजागर किया है। इसका समाधान जापान की प्रसिद्ध बौद्ध ‘झेन परंपरा’ की चाय-विधि ‘चा-नो-यू’ (टी-सेरेमनी) में मिलता है। यह विधि मनुष्य को भूतकाल और भविष्यकाल की चिंताओं से मुक्त करके वर्तमान क्षण (Present Moment) के असीम आनंद में जीना सिखाती है।
मास्टर सारांश सारणी: ‘पतझर में टूटी पत्तियाँ’ के दोनों प्रसंगों का तुलनात्मक अध्ययन
| अध्ययन बिंदु | प्रसंग 1: गिन्नी का सोना | प्रसंग 2: झेन की देन PDF |
| केंद्रीय विषय / दर्शन | शुद्ध आदर्शवाद बनाम अवसरवादी व्यावहारिकता। | मानसिक तनाव का निवारण एवं वर्तमान में जीने की कला। |
| प्रयुक्त मुख्य प्रतीक / माध्यम | शुद्ध सोना, ताँबा, गिन्नी (सिक्के) का सोना। | चा-नो-यू (टी-सेरेमनी), पर्णकुटी, धीमी चाय की चुस्कियाँ। |
| समस्या का विश्लेषण | व्यावहारिक लोग आदर्शों को स्वार्थवश नीचे गिरा देते हैं। | अमेरिका से प्रतिस्पर्धा के कारण दिमाग का इंजन टूटना व 80% मनोरोगी होना। |
| आदर्श समाधान / संदेश | शुद्ध आदर्शों को समाज का मार्गदर्शक बनाए रखना। | भूत और भविष्य दोनों मिथ्या हैं; केवल वर्तमान क्षण ही शाश्वत सत्य है। |
| प्रमुख जीवन-मूल्य | नैतिक शुचिता, गांधीवादी दर्शन, उच्च जीवन-मूल्य। | मानसिक शांति, मौन साधना, ध्यान (Meditation), संतुलन। |
2. NCERT पाठ्यपुस्तक अभ्यास: प्रश्न एवं आदर्श उत्तर (Topper’s Point-to-Point Format)
(क) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर (25-30 शब्दों में) दीजिए:
Question 1. ‘गिन्नी का सोना’ और ‘शुद्ध सोना’ में क्या अंतर बताया गया है?
Answer:
- शुद्ध सोना: यह बिना किसी मिलावट का 100% खरा सोना होता है, जिसमें कोई खोट नहीं होती।
- गिन्नी का सोना: इसमें थोड़ा-सा ताँबा मिलाया जाता है, जिससे यह अधिक मजबूत और चमकदार बन जाता है तथा इससे सुंदर जेवर (आभूषण) बनाए जा सकते हैं।
Question 2. ‘प्रैक्टिकल आइडियलिस्ट’ किसे कहा गया है और लेखक की इस पर क्या आपत्ति है?
Answer:
‘प्रैक्टिकल आइडियलिस्ट’ उन व्यावहारिक लोगों को कहा जाता है, जो आदर्शों की बात तो करते हैं, परंतु व्यावहारिकता के नाम पर अपने व्यक्तिगत स्वार्थ और लाभ को प्राथमिकता देते हैं।
लेखक की आपत्ति यह है कि ऐसे लोग आदर्शों को आगे नहीं बढ़ाते, बल्कि अपने लाभ के लिए शुद्ध आदर्शों को नीचे गिराकर समाज का नैतिक पतन कर देते हैं।
Question 3. जापान में अधिकांश लोगों के ‘मानसिक रूप से बीमार’ (मनोरोगी) होने के क्या कारण हैं? [CBSE 2020, 2023]
Answer: जापान में लगभग 80% लोगों के मनोरोगी होने के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:
- जीवन की अत्यधिक तेज रफ्तार: लोग सामान्य गति से चलने के बजाय भागते हैं और एक महीने का काम एक ही दिन में पूरा करने का प्रयास करते हैं।
- अमेरिका से अंधी प्रतिस्पर्धा: तीव्र आर्थिक होड़ के कारण उनके दिमाग की गति पर अत्यधिक तनाव का दबाव बढ़ जाता है, जिससे मानसिक संतुलन बिगड़ जाता है।
Question 4. लेखक जापानी मित्र के साथ चाय पीने कहाँ गया था और उस स्थान की क्या विशेषता थी?
Answer:
लेखक अपने जापानी मित्र के साथ चाय पीने एक छह मंजिला इमारत की छत पर बनी गत्ते की एक छोटी-सी पर्णकुटी (झोंपड़ी) में गया था।
विशेषता: उस कुटी के बाहर बेढब-सा मिट्टी का बर्तन रखा था जिसमें हाथ-पैर धोने का स्वच्छ जल था। भीतर केवल तीन आदमियों के बैठने की चटाई बिछी थी और वहाँ असीम शांति, सादगी तथा प्राकृतिक वातावरण था।
Question 5. ‘चा-नो-यू’ की पूरी प्रक्रिया को संक्षेप में लिखिए। [CBSE 2019, 2022]
Answer:
‘चा-नो-यू’ जापानी चाय-विधि (टी-सेरेमनी) है:
- चाजीन (मेजबान) झुककर अतिथियों का स्वागत करता है।
- वह अंगीठी सुलगाकर उस पर चायदानी रखता है और बर्तनों को तौलिए से साफ करता है।
- तैयार चाय को प्यालों में भरकर अतिथियों के आगे रखा जाता है।
- प्यालों में केवल दो-दो घूँट चाय होती है, जिसे अत्यंत शांत वातावरण में डेढ़-दो घंटे तक चुस्की लेकर धीरे-धीरे पिया जाता है।
(ख) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर (50-60 शब्दों में) दीजिए:
Question 6. शुद्ध आदर्शों की तुलना सोने से और व्यावहारिकता की तुलना ताँबे से क्यों की गई है? [CBSE 2019, 2024]
Answer:
लेखक ने यह तुलना नैतिक और व्यावहारिक स्वरूप को समझाने के लिए की है:
- सोना (शुद्ध आदर्श): जिस प्रकार शुद्ध सोना मूल्यवान, स्थायी और अपरिवर्तनीय होता है, उसी प्रकार सत्य, अहिंसा, त्याग और परोपकार जैसे शुद्ध आदर्श समाज को अमर और उच्च बनाए रखते हैं।
- ताँबा (व्यावहारिकता): ताँबा सोने की तुलना में सस्ता और सामान्य धातु है। व्यावहारिकता केवल दैनिक जीवन के कार्यों को चलाने और स्वार्थ-पूर्ति का साधन है।
जिस प्रकार ताँबा मिलने से सोने की कीमत नहीं बढ़ती बल्कि उसका खोट बढ़ता है, उसी प्रकार केवल व्यावहारिक सोच कभी महान नहीं हो सकती। समाज का वास्तविक कल्याण केवल शुद्ध आदर्शों पर टिके रहने से ही होता है।
Question 7. गांधी जी के संदर्भ में ‘प्रैक्टिकल आइडियलिस्ट’ शब्द का प्रयोग किस प्रकार भिन्न है? [BOARD EXAM FAVORITE / CBSE 2023]
Answer:
गांधी जी को भी दुनिया ‘प्रैक्टिकल आइडियलिस्ट’ मानती थी, परंतु उनका दृष्टिकोण साधारण स्वार्थी लोगों से सर्वथा विपरीत था:
- गांधी जी भली-भाँति जानते थे कि जनसाधारण की क्षमता क्या है, इसलिए वे व्यावहारिकता को पहचानते थे।
- परंतु उन्होंने कभी भी अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए आदर्शों को नीचे नहीं गिरने दिया।
- वे व्यावहारिकता के स्तर को ऊपर उठाकर आदर्शों के धरातल तक ले जाते थे और पूरे समाज को सत्य व अहिंसा के मार्ग पर चलाते थे।
अतः गांधी जी व्यावहारिकता में आदर्शों का ताँबा नहीं मिलाते थे, बल्कि ताँबे को भी शुद्ध सोने जैसा पावन बना देते थे।
Question 8. टी-सेरेमनी में चाय पीते समय लेखक को अपने भीतर क्या परिवर्तन अनुभव हुआ? [CBSE 2020, 2024 HOTS]
Answer:
टी-सेरेमनी के नीरव और शांत वातावरण में चाय पीते समय लेखक के भीतर निम्नलिखित अद्भुत मानसिक परिवर्तन घटित हुए:
- विचारों की शून्यता: चाय की मंद-मंद चुस्कियाँ लेते हुए लेखक के दिमाग की तेज रफ्तार धीरे-धीरे धीमी होने लगी और अंततः विचार पूरी तरह बंद (शून्य) हो गए।
- मौन की अनुभूति: लेखक को कमरे के भीतर और बाहर व्याप्त सन्नाटा भी स्पष्ट रूप से सुनाई देने लगा।
- समय की सीमाओं से मुक्ति: लेखक को लगा कि बीता हुआ कल (भूतकाल) और आने वाला कल (भविष्यकाल) दोनों मिथ्या हैं; केवल जो वर्तमान क्षण उसके सामने है, वही शाश्वत और वास्तविक सत्य है। लेखक ने अनुभव किया कि उसे असीम मानसिक शांति और मोक्ष (जीना किसे कहते हैं) का वास्तविक ज्ञान प्राप्त हो गया है।
3. भाव एवं आशय स्पष्टीकरण (दीर्घ उत्तरीय प्रश्न)
Question 9. निम्नलिखित पंक्तियों का आशय स्पष्ट कीजिए:
(क) समाज के पास अगर उठान के लिए कुछ आदर्श हैं, तो वे केवल शुद्ध सोने जैसे लोगों की बदौलत ही हैं।
Answer:
आशय: लेखक इस पंक्ति द्वारा यह दार्शनिक सत्य स्थापित करते हैं कि मानव सभ्यता का नैतिक और आत्मिक विकास केवल व्यावहारिकता या धन-दौलत कमाने वाले लोगों से नहीं हुआ है। समाज का चरित्र निर्माण और मानवीय गरिमा उन महापुरुषों, संतों और चिंतकों (शुद्ध सोने जैसे लोगों) के कारण बची हुई है, जिन्होंने बिना किसी निजी स्वार्थ के सत्य, त्याग और लोक-कल्याण के शाश्वत आदर्शों की स्थापना की। यदि ऐसे आदर्शवादी लोग न हों, तो समाज केवल स्वार्थ और पशु-प्रवृत्ति का अखाड़ा बनकर नष्ट हो जाएगा।
(ख) हम या तो बीते हुए दिनों की खट्टी-मीठी यादों में उलझे रहते हैं या भविष्य के रंगीन सपने देखते रहते हैं। असल में दोनों काल मिथ्या हैं। जो हमारे सामने है, वही सत्य है। [BOARD EXAM FAVORITE / CBSE 2022, 2023]
Answer:
आशय: मानव मन की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि वह कभी वर्तमान में स्थिर नहीं रहता। वह या तो भूतकाल के पश्चाताप और यादों में घुटता रहता है, या फिर भविष्य की अनिश्चित चिंताओं और योजनाओं में दौड़ता रहता है। लेखक स्पष्ट करते हैं कि जो बीत गया वह वापस नहीं आ सकता और जो आने वाला है वह अभी आया ही नहीं है—अतः दोनों काल भ्रम (मिथ्या) हैं। सच्चा जीवन केवल उसी ‘वर्तमान क्षण’ में है जो इस समय हमारे पास उपस्थित है। वर्तमान को पूरी सजगता और शांति से जीना ही जीवन का सर्वोच्च आनंद है।
(ग) दिमाग को ‘स्पीड’ का इंजन लगाने पर वह हजार गुना अधिक रफ्तार से दौड़ने लगता है। फिर एक क्षण ऐसा आता है जब दिमाग का तनाव बढ़ जाता है और पूरा इंजन टूट जाता है।
Answer: आशय: लेखक आधुनिक भौतिकवादी समाज की अत्यधिक प्रतिस्पर्धा पर तीखा कटाक्ष करते हैं। जब मनुष्य अपनी स्वाभाविक मानसिक क्षमता से परे जाकर धन, पद और सफलता पाने की अंधी होड़ में अपने मस्तिष्क पर निरंतर दबाव बनाता है, तो उसका दिमाग असंतुलित हो जाता है। इस अनियंत्रित मानसिक खिंचाव का अंत मस्तिष्क के विकार, अनिद्रा, अवसाद (Depression) और मानसिक पक्षाघात (मानसिक रोग) के रूप में होता है।
4. भाषा अध्ययन एवं व्यावहारिक व्याकरण
Question 10. निम्नलिखित मुहावरों का अर्थ स्पष्ट करते हुए वाक्यों में प्रयोग कीजिए:
- हवा में उड़ना (बहुत तेज गति से चलना / घमंड होना): आधुनिक जीवन में लोग शांत रहने के बजाय हवा में उड़ने का प्रयास करते हैं।
- दिन-दूनी रात-चौगुनी उन्नति करना (अत्यधिक तीव्र गति से प्रगति करना): कठोर परिश्रम के बल पर उसने अपने व्यवसाय में दिन-दूनी रात-चौगुनी उन्नति की।
- पर्दा फाश होना (भेद खुल जाना / सच्चाई सामने आना): पुलिस की जाँच से जालसाज के सभी काले कारनामों का पर्दा फाश हो गया।
- टूट जाना (हिम्मत हारना / मानसिक संतुलन खोना): अत्यधिक तनाव और लगातार असफलता के कारण उसका मनोबल टूट गया।
Question 11. पाठ में आए निम्नलिखित शब्दों के विलोम शब्द लिखिए:
| मूल शब्द | विलोम शब्द |
| शुद्ध | अशुद्ध / मिलावटी |
| आदर्श | यथार्थ / अनादर्श |
| शाश्वत | क्षणभंगुर / नश्वर |
| अनंत | शांत / ससीम / सीमित |
| सन्नाटा | कोलाहल / शोर |
| मिथ्या | सत्य / यथार्थ |
5. 15 उच्च-स्तरीय बोर्ड परीक्षा मॉडल प्रश्न (CBSE HOTS & FAQs)
Question 1. ‘गिन्नी का सोना’ प्रसंग में शुद्ध सोने में ताँबा मिलाने से क्या तात्पर्य है?
Answer:
यहाँ ‘शुद्ध सोने में ताँबा मिलाना’ शुद्ध नैतिक आदर्शों में सांसारिक व्यावहारिकता, अवसरवादिता और व्यक्तिगत स्वार्थ का समावेश करना है। इससे व्यक्ति समाज में तात्कालिक रूप से सफल और प्रभावशाली तो दिखाई देता है, परंतु उसके चरित्र की आंतरिक शुद्धता नष्ट हो जाती है।
Question 2. ‘झेन’ (Zen) शब्द का मूल स्रोत क्या है और इसका क्या दार्शनिक अर्थ है?
Answer:
‘झेन’ शब्द संस्कृत के ‘ध्यान’ (Dhyana) शब्द का जापानी रूपांतरण है (संस्कृत ‘ध्यान’ → चीनी ‘चान’ → जापानी ‘झेन’)। इसका दार्शनिक अर्थ है—मन की समस्त चंचलता और विचारों को शांत करके आत्म-साक्षात्कार करना तथा पूर्णतः वर्तमान क्षण में सजग रहना।
Question 3. जापानी टी-सेरेमनी में अधिकतम कितने व्यक्तियों को प्रवेश दिया जाता है और क्यों?
Answer:
टी-सेरेमनी में एक बार में केवल तीन व्यक्तियों (अतिथियों) को ही प्रवेश दिया जाता है।
कारण: इसका मुख्य उद्देश्य शांति, एकाग्रता और मौन साधना बनाए रखना है। अधिक लोगों के आने से शांति भंग होने और कोलाहल उत्पन्न होने का भय रहता है।
Question 4. ‘चाजीन’ (Chajin) कौन होता है और उसकी क्या भूमिका होती है?
Answer:
‘चाजीन’ जापानी टी-सेरेमनी में चाय पिलाने वाला विशेष मेजबान (Tea Master) होता है। उसकी भूमिका अत्यंत गरिमामयी, शांत और सलीके से अतिथियों का स्वागत करना, अंगीठी पर चाय बनाना, बर्तनों को शुद्ध करना और चाय परोसकर शांति का वातावरण निर्मित करना है।
Question 5. ‘प्रैक्टिकल’ लोगों की समाज को क्या देन होती है और लेखक उन्हें आगे ले जाने वाला क्यों नहीं मानता?
Answer:
प्रैक्टिकल लोग समाज को केवल तात्कालिक लाभ या भौतिक सुविधाएँ दे सकते हैं। लेखक उन्हें समाज को आगे ले जाने वाला इसलिए नहीं मानता क्योंकि वे केवल अपना स्वार्थ और लाभ देखते हैं। जब हर कोई केवल अपना नफा-नुकसान देखेगा, तो समाज का पतन होगा। समाज को ऊपर उठाने का कार्य केवल त्यागी और आदर्शवादी लोग ही करते हैं।
Question 6. जापान में मानसिक रोगियों की संख्या 80% तक पहुँचने का क्या मनोवैज्ञानिक कारण है?
Answer: जापानी समाज पश्चिमी देशों से आगे निकलने की होड़ में भौतिक दौड़ में अत्यधिक अंधा हो गया। उन्होंने जीवन की स्वाभाविक गति को खो दिया। अत्यधिक काम के घंटे, निरंतर प्रतिस्पर्धा, अकेलेपन और आराम के अभाव ने उनके मस्तिष्क के न्यूरॉन्स और मानसिक संतुलन पर अत्यधिक दबाव डाला, जिससे वे मनोरोगी बन गए।
Question 7. ‘पर्णकुटी’ की बनावट और वातावरण किस भाव को व्यक्त करता है?
Answer:
पर्णकुटी की सादगी, गत्ते की दीवारें, मिट्टी का सकोरा और चटाई का फर्श प्राकृतिक सादगी, आडंबरहीनता, शांति और कृत्रिम भौतिकता के पूर्ण त्याग के भाव को व्यक्त करता है।
Question 8. टी-सेरेमनी में प्याले में केवल दो घूँट चाय ही क्यों दी जाती है?
Answer:
क्योंकि टी-सेरेमनी का उद्देश्य पेट भरना या प्यास बुझाना नहीं है, बल्कि ‘मन को शांत करना और चाय की हर बूँद के स्वाद व ध्वनि को महसूस करना’ है। कम चाय होने से व्यक्ति उसे धीरे-धीरे, शांत भाव से ओठों से लगाकर पीता है, जिससे ध्यान (Meditation) घटित होता है।
Question 9. अभिकथन (A) और तर्क (R) आधारित प्रश्न:
अभिकथन (A): टी-सेरेमनी मनुष्य को मानसिक शांति और वर्तमान में जीने की अनुभूति कराती है।
तर्क (R): चाय पीने की इस विधि में अत्यंत शांत वातावरण और धीमी गति से कार्य किया जाता है।
(क) A और R दोनों सही हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
(ख) A और R दोनों सही हैं, परंतु R, A की सही व्याख्या नहीं है।
(ग) A सही है, परंतु R गलत है।
(घ) A गलत है, परंतु R सही है।
Answer:
सही उत्तर: (क) A और R दोनों सही हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
स्पष्टीकरण: टी-सेरेमनी का नीरव, शांत परिवेश और धीमी प्रक्रिया ही दिमाग के तनाव को समाप्त कर वर्तमान की शांति प्रदान करती है।
Question 10. पाठ के आधार पर बताइए कि ‘सच्चा सोना’ समाज में किन लोगों का प्रतीक है?
Answer:
‘सच्चा सोना’ समाज के उन ऋषियों, संतों, स्वतंत्रता सेनानियों और गांधी जैसे महान पुरुषों का प्रतीक है, जिन्होंने कठिनाइयों और अभावों के बावजूद अपने नैतिक सिद्धांतों, सत्य, न्याय और मानवीय मूल्यों से कभी कोई समझौता नहीं किया।
Question 11. क्या आज के छात्र-जीवन में ‘झेन की देन’ का कोई व्यावहारिक उपयोग है? [Value-Based]
Answer:
हाँ, आज के छात्रों के लिए यह अत्यंत उपयोगी है। छात्र परीक्षा के डर, भविष्य की चिंताओं और नंबरों की अंधी होड़ में मानसिक तनाव का शिकार होते हैं। ‘झेन की देन’ उन्हें सिखाती है कि भविष्य की व्यर्थ चिंता छोड़कर वर्तमान समय के अध्ययन पर पूरी एकाग्रता और शांति से ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
Question 12. ‘चा-नो-यू’ में ‘बर्तनों की आवाज़’ और ‘हवा की सरसराहट’ का क्या महत्त्व है?
Answer:
पूर्ण सन्नाटे में बर्तनों की धीमी खनक और पत्तों की सरसराहट मन की एकाग्रता को बढ़ाने वाले श्रव्य माध्यम हैं। जब बाहर का शोर बंद हो जाता है, तो प्रकृति की सूक्ष्म ध्वनियाँ भी अंतर्मन को गहरा विश्राम और शांति प्रदान करती हैं।
Question 13. ‘पतझर में टूटी पत्तियाँ’ शीर्षक का क्या लाक्षणिक अर्थ है?
Answer:
‘पतझर में टूटी पत्तियाँ’ उन पुराने, जीर्ण-शीर्ण विचारों, व्यर्थ की चिंताओं, तनावों और अवसरवादी व्यावहारिकता के त्याग का प्रतीक है। जिस प्रकार पतझर में पुरानी पत्तियाँ गिरकर नए पत्तों के आने का मार्ग बनाती हैं, उसी प्रकार हमें भी व्यर्थ के तनावों को झाड़कर जीवन में शांति और आदर्शों की नई शुरुआत करनी चाहिए।
Question 14. केस स्टडी प्रश्न (Case Study Scenario):
एक मल्टीनेशनल कंपनी का युवा सॉफ्टवेयर इंजीनियर दिन में 16 घंटे काम करता है। वह हमेशा भविष्य के प्रमोशन और टारगेट को लेकर चिंतित रहता है, जिसके कारण उसे अनिद्रा और उच्च रक्तचाप की बीमारी हो गई है।
रवींद्र केलेकर के पाठ ‘झेन की देन’ के आलोक में उस इंजीनियर को जीवन-शैली सुधारने हेतु क्या परामर्श दिया जा सकता है?
Answer: उस इंजीनियर को ‘झेन की देन’ के आधार पर निम्नलिखित परामर्श दिया जाना चाहिए:
- वह अमेरिका जैसी अंधी प्रतिस्पर्धा और ‘स्पीड’ के इंजन को धीमा करे।
- प्रतिदिन कुछ समय मौन, ध्यान और वर्तमान क्षण में शांत बैठने (टी-सेरेमनी जैसी शांत आदतों) के लिए निकाले।
- यह समझे कि भविष्य केवल एक कल्पना (मिथ्या) है; यदि वह वर्तमान को शांति और स्वास्थ्य के साथ जिएगा, तभी वास्तविक जीवन का आनंद ले सकेगा।
Question 15. इस संपूर्ण पाठ का अंतिम और सार्वभौमिक संदेश क्या है?
Answer:
इस पाठ का सर्वोच्च संदेश है—”जीवन में सफलता के लिए आदर्शों की पवित्रता को न खोएँ और सुख के लिए वर्तमान क्षण को पूरी शांति, सजगता और कृतज्ञता के साथ जिएँ।”
6. CONCLUDING BOARD TOPPER STRATEGY
सीबीएसई कक्षा 10 हिंदी ‘ब’ की बोर्ड परीक्षा में ‘पतझर में टूटी पत्तियाँ’ अध्याय से पूर्ण अंक (Full Marks) प्राप्त करने की विशेष युक्तियाँ:
- दोनों प्रसंगों का संतुलित ज्ञान: ‘गिन्नी का सोना’ में गांधी जी का संदर्भ और ‘झेन की देन’ में टी-सेरेमनी (चा-नो-यू) की शब्दावली का प्रयोग अनिवार्य रूप से करें और मुख्य शब्दों को रेखांकित (Underline) करें।
- जापानी पारिभाषिक शब्द: ‘चा-नो-यू’, ‘चाजीन’, ‘पर्णकुटी’, और ‘झेन दर्शन’ जैसे प्रामाणिक शब्दों का उत्तर में शुद्ध वर्तनी के साथ प्रयोग करें।
- दार्शनिक निष्कर्ष: जब भी ‘वर्तमान काल’ से जुड़ा प्रश्न आए, तो स्पष्ट रूप से लिखें कि “भूतकाल बीत चुका है और भविष्यकाल आया नहीं है, अतः दोनों मिथ्या हैं; केवल वर्तमान ही शाश्वत सत्य है।”
