NCERT Solutions & Master Notes for Class 10 Hindi स्पर्श (भाग-2) गद्य खंड पाठ 12: अब कहाँ दूसरे के दुख से दुखी होने वाले (निदा फ़ाज़ली) (2026-2027)
1. SEO STRATEGY INTRODUCTION & CHAPTER MASTER OVERVIEW
केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) की कक्षा 10 हिंदी पाठ्यक्रम ‘ब’ (Course B) की पाठ्यपुस्तक ‘स्पर्श भाग-2’ के गद्य-खंड का बारहवाँ अध्याय ‘अब कहाँ दूसरे के दुख से दुखी होने वाले’ आधुनिक हिंदी और उर्दू साहित्य के अत्यंत प्रतिष्ठित शायर एवं लेखक निदा फ़ाज़ली द्वारा रचित एक अत्यंत संवेदनशील, यथार्थपरक, पर्यावरण-केंद्रित और विचारोत्तेजक संस्मरणात्मक निबंध है। बोर्ड परीक्षाओं के दृष्टिकोण से यह अध्याय पारिस्थितिकीय असंतुलन (Ecological Imbalance) के दुष्परिणाम, मानव और मूक प्राणियों के अंतर्संबंध, प्राचीन मानवीय करुणा बनाम आधुनिक संवेदनहीनता, तथा मूल्यपरक (Value-Based) दीर्घ उत्तरीय प्रश्नों (HOTS) के लिए सर्वाधिक अंकदायी अध्यायों में से एक है।
इस पाठ में लेखक ने पौराणिक आख्यानों, ऐतिहासिक व्यक्तित्वों और अपने व्यक्तिगत पारिवारिक संस्मरणों के माध्यम से यह दर्शाया है कि किस प्रकार प्राचीन काल का मानव प्रकृति, पशु-पक्षियों, जल-स्रोतों और समूची सृष्टि के प्रत्येक जीव के प्रति गहरी आत्मीयता और दया का भाव रखता था। हज़रत सुलेमान (सोलोमन) अपनी विशाल सेना के साथ गुजरते हुए भी छोटी-छोटी चींटियों की रक्षा हेतु रुक जाते हैं और उन्हें अभयदान देते हैं। पैगंबर नूह एक घायल कुत्ते को अनजाने में दुत्कार देने पर जीवनभर पश्चाताप के आँसू बहाते हैं। लेखक की अपनी माँ अनजाने में कबूतर का अंडा फूट जाने पर दिनभर का रोज़ा रखकर ईश्वर से गिड़गिड़ाकर क्षमा-याचना करती हैं।
इसके विपरीत, आधुनिक काल का मानव अपने असीमित लालच, स्वार्थपरता और औद्योगीकरण की अंधी दौड़ में अंधा हो चुका है। बिल्डरों द्वारा समुद्र के किनारे अतिक्रमण, जंगलों की अंधाधुंध कटाई और कंक्रीट के बड़े-बड़े बहुमंजिला भवनों के निर्माण ने मूक पशु-पक्षियों के प्राकृतिक आवास को छीनकर उन्हें बेघर कर दिया है। लेखक आगाह करते हैं कि प्रकृति अत्यंत क्षमाशील और सहनशील है, परंतु जब उसके धैर्य की सीमा टूटती है, तो वह सुनामी, भूकंप, चक्रवाती तूफ़ान, अत्यधिक गर्मी और अनियंत्रित बाढ़ के रूप में अपना विनाशकारी रौद्र रूप दिखाती है, जिसका जीवंत उदाहरण मुंबई (बंबई) में समुद्र द्वारा तीन विशाल जहाजों को खिलौना गेंदों की तरह उठाकर सड़कों पर फेंक देने की ऐतिहासिक घटना है।
सीबीएसई बोर्ड परीक्षा में पूरे अंक (Full Marks) प्राप्त करने के लिए विद्यार्थियों को उत्तर-पुस्तिका में ‘पारिस्थितिकीय संतुलन’, ‘सह-अस्तित्व (Co-existence)’, ‘मूक जीवों के प्रति संवेदनशीलता’, ‘प्रकृति का रौद्र प्रतिशोध’, ‘आधुनिक नगरीकरण की संकीर्णता’, तथा ‘सार्वभौमिक एकात्मता (मिट्टी से मिट्टी मिले)’ जैसे मानक पारिभाषिक शब्दों और कीवर्ड्स का अनिवार्य रूप से प्रयोग और रेखांकन (Underline) करना चाहिए।
मास्टर सारांश सारणी: ‘अब कहाँ दूसरे के दुख से दुखी होने वाले’ के प्रमुख स्तंभ एवं तुलनात्मक आयाम
| मुख्य पात्र / प्रसंग | ऐतिहासिक व पारिवारिक संदर्भ | प्रसंग का मूल विवरण | निहित दार्शनिक, नैतिक एवं पर्यावरणीय संदेश |
| हज़रत सुलेमान (सोलोमन) | ईसा पूर्व के एक महान पैगंबर व सम्राट। | चींटियों के भय को सुनकर लश्कर रोकना और कहना कि वे सबके लिए रहमत हैं। | शक्तिशाली होने पर भी दुर्बल और मूक प्राणियों के प्रति परम दया व विनम्रता रखना। |
| पैगंबर नूह (अलफ़ज़ल) | ईश्वर के एक प्राचीन पैगंबर। | घायल कुत्ते को दुत्कारने पर कुत्ते की दार्शनिक सीख और जीवनभर प्रायश्चित में रोना। | ईश्वर की बनाई किसी भी रचना को हीन न समझना; समस्त जीवों में एक ही चेतना है। |
| लेखक की माँ का प्रसंग | ग्वालियर के पैतृक घर की घटना। | कबूतर का अंडा अनजाने में टूटने पर दिनभर का निर्जल रोज़ा रखना और नमाज़ पढ़ना। | जीव-हिंसा के प्रति गहरी आत्म-ग्लानि और ईश्वर के समक्ष सच्चा नैतिक पश्चाताप। |
| समुद्र का रौद्र रूप | मुंबई में बिल्डरों का अनियंत्रित अतिक्रमण। | समुद्र द्वारा तीन विशालकाय जहाजों को खिलौना गेंद की तरह उठाकर तटों पर फेंकना। | प्रकृति के साथ खिलवाड़ का भयानक परिणाम; मनुष्य की वैज्ञानिक सीमाओं की चेतावनी। |
| आधुनिक जीवन व फ्लैट संस्कृति | मुंबई (वर्सोवा) का आधुनिक परिवेश। | कबूतरों के आने पर खिड़की में जाली लगाना और उन्हें बाहर धूप-ठंड में बेघर छोड़ना। | आधुनिक मानव की चरम संवेदनहीनता, स्वार्थपरता और ‘जियो और जीने दो’ का पतन। |
2. विस्तृत पाठ सारांश एवं विश्लेषणात्मक व्याख्या (DETAILED CHAPTER SUMMARY)
(क) सृष्टि का प्राचीन स्वरूप और मानव का सह-अस्तित्व
निदा फ़ाज़ली जी पाठ का आरंभ इस गहन दार्शनिक सत्य के साथ करते हैं कि यह पूरी पृथ्वी किसी एक व्यक्ति, जाति या केवल मानव जाति की निजी जागीर नहीं है। इस धरती पर मानव के साथ-साथ पशु, पक्षी, वृक्ष, नदियाँ, समुद्र, पहाड़ और सूक्ष्म कीट-पतंगों का भी बराबर का प्राकृतिक अधिकार है।
प्राचीन काल में मनुष्य प्रकृति की गोद में, खुले आँगन, बड़े-बड़े दालानों और पेड़-पौधों के बीच संयुक्त परिवारों में रहता था। उस समय संसार एक विशाल परिवार (वसुधैव कुटुंबकम्) के समान था, जहाँ मनुष्य अन्य जीवों के दुख-दर्द को अपनी ही पीड़ा समझता था और प्रकृति के संतुलन को बनाए रखना अपना परम धर्म मानता था।
(ख) हज़रत सुलेमान और चींटियों का ऐतिहासिक प्रसंग
लेखक बाइबिल और कुरआन में वर्णित हज़रत सुलेमान (जिन्हें सोलोमन भी कहा जाता है) का अत्यंत प्रेरक प्रसंग प्रस्तुत करते हैं। सुलेमान केवल मानवों के ही राजा नहीं थे, बल्कि वे सभी पशु-पक्षियों और जीव-जंतुओं की भाषा भी समझते थे।
एक बार सुलेमान अपने विशाल सैन्य लश्कर (फौज) और घोड़ों के साथ किसी अभियान पर जा रहे थे। रास्ते में ज़मीन पर रेंगती हुई चींटियों के समूह ने घोड़ों की टापों की भयानक गूँज सुनी, तो वे भयभीत होकर एक-दूसरे से कहने लगीं—“जल्दी-जल्दी अपने बिलों की ओर चलो, सुलेमान की फौज आ रही है!”
सुलेमान ने चींटियों की यह घबराहट भरी आवाज़ दूर से ही सुन ली। उन्होंने तुरंत अपने पूरे लश्कर को रोक दिया और उन नन्हीं चींटियों से अत्यंत विनम्रता और वात्सल्य भाव से कहा—”घबराओ नहीं चींटियो! खुदा ने मुझे सबके लिए रहमत (दया और आशीर्वाद) बनाकर भेजा है, मैं किसी के लिए मुसीबत नहीं हूँ।” इसके बाद पूरी सेना उनके बिलों में सुरक्षित पहुँचने की प्रतीक्षा करती रही। यह प्रसंग सिद्ध करता है कि एक महान शासक का वास्तविक बड़प्पन दुर्बल और मूक जीवों की रक्षा करने में निहित होता है।
(ग) पैगंबर नूह और घायल कुत्ते की दार्शनिक सीख
दूसरा ऐतिहासिक प्रसंग पैगंबर नूह (अलफ़ज़ल) का है। अरब में उन्हें ‘नूह’ के नाम से याद किया जाता है, जिसका अर्थ होता है—’निरंतर विलाप करने वाला या रोने वाला’।
कथा के अनुसार, एक बार नूह के सामने से एक अत्यंत गंदा, घायल और ज़ख्मी कुत्ता गुजरा। नूह ने घृणावश मुँह फेरते हुए उसे दुत्कार कर कहा—“दूर हट, गंदे कुत्ते!”
उस घायल कुत्ते ने पलटकर नूह को एक ऐसा दार्शनिक उत्तर दिया जिसने उनके अंतरात्मा को झकझोर दिया। कुत्ते ने कहा—”हे नूह! न तो मैं अपनी पसंद से कुत्ता बना हूँ और न तुम अपनी मर्जी से इंसान बने हो। हम दोनों को एक ही परमात्मा (खुदा) ने अपनी इच्छा से गढ़ा है। यदि तुम्हें मुझसे घृणा है, तो वस्तुतः यह घृणा उस सृष्टिकर्ता के प्रति है जिसने मुझे यह रूप दिया।”
कुत्ते की इस खरी और आध्यात्मिक बात को सुनकर नूह आत्म-ग्लानि और पश्चाताप से भर गए। उन्होंने अनुभव किया कि एक मूक प्राणी का अनादर करके उन्होंने परमात्मा का अपमान किया है। वे जीवनभर इस भूल के प्रायश्चित में ईश्वर के सम्मुख आँसू बहाते रहे।
(घ) लेखक की माँ की संवेदनशीलता और कबूतर के अंडों का प्रसंग
लेखक अपने पारिवारिक जीवन और अपनी माँ की असीम संवेदनशीलता का मार्मिक संस्मरण साझा करते हैं। लेखक का पैतृक घर ग्वालियर में था। वहाँ उनके घर के दालान के रोशनदान में कबूतर के एक जोड़े ने घोंसला बनाकर दो अंडे दिए थे।
एक दिन एक बिल्ली ने झपटकर रोशनदान से एक अंडा नीचे गिरा दिया, जिससे वह टूट गया। लेखक की माँ ने जब यह देखा, तो उन्हें अत्यंत दुख हुआ। वे एक स्टूल पर चढ़कर दूसरे अंडे को बिल्ली की पहुँच से बचाकर सुरक्षित रखने का प्रयास करने लगीं। परंतु दुर्भाग्यवश, माँ के हाथ से फिसलकर वह दूसरा अंडा भी फर्श पर गिरकर चकनाचूर हो गया।
कबूतर का जोड़ा अपने दोनों बच्चों (अंडों) के नष्ट हो जाने के वियोग में सिर पर मँडराते हुए व्याकुल होकर फड़फड़ाने लगा। कबूतरों की इस मूक चीत्कार और विरह-वेदना को देखकर माँ की आँखों से आँसुओं की धारा बह निकली।
माँ ने इसे एक घोर पाप माना। इस अनजाने में हुए अपराध का प्रायश्चित करने के लिए माँ ने पूरा दिन निर्जल रोज़ा (उपवास) रखा, खाना-पीना त्याग दिया और दिनभर नमाज़ पढ़कर रोती रहीं तथा खुदा से गिड़गिड़ाकर उस बेजुबान पक्षी के बच्चे को मारने का गुनाह माफ करने की दुआ माँगती रहीं। माँ का यह आचरण प्रकृति और मूक जीवों के प्रति उनके निश्छल प्रेम का साक्षात प्रमाण था।
(ङ) आधुनिक अंधाधुंध नगरीकरण और समुद्र का रौद्र प्रतिशोध
लेखक वर्तमान समय की भयावह विसंगति पर आते हैं। आज मनुष्य ने अपने असीमित लोभ, जनसंख्या विस्फोट और व्यावसायिक स्वार्थ के कारण प्रकृति के संतुलन को पूरी तरह नष्ट कर दिया है।
बिल्डरों ने अपने मुनाफे के लिए समुद्र के किनारे की ज़मीनों पर कब्जा करना शुरू कर दिया है। वे कंक्रीट की विशाल दीवारें खड़ी करके समुद्र को निरंतर पीछे धकेल रहे हैं। पेड़ों की अंधाधुंध कटाई कर दी गई है, जिससे पक्षियों के प्राकृतिक आशियाने नष्ट हो गए हैं। प्रकृति मनुष्य के इस अत्याचार को सदियों से एक उदार और विशाल हृदय वाले महान पुरुष की भाँति चुपचाप सहती आ रही थी।
परंतु जब मनुष्य की धृष्टता अपनी चरम सीमा को पार कर गई, तो प्रकृति और समुद्र का धैर्य टूट गया। लेखक 26 जुलाई 2005 को मुंबई (बंबई) में आई प्रलयंकारी सुनामी और भीषण बाढ़ का स्मरण कराते हैं। क्रोधित समुद्र ने अपनी असीम शक्ति का एक भयानक नमूना दिखाया। उसने अपनी छाती पर तैरते तीन विशालकाय मालवाहक पानी के जहाजों को बच्चों की खिलौना गेंदों की तरह उठाकर तीन अलग-अलग दिशाओं में फेंक दिया:
- पहला जहाज़ वर्ली के समुद्र तट पर औंधे मुँह गिरा।
- दूसरा जहाज़ बांद्रा में कार्टर रोड के सामने पत्थरों पर चकनाचूर होकर गिरा।
- तीसरा जहाज़ जुहू के समुद्र किनारे सैलानियों के बीच फँस गया और फिर कभी तैरने योग्य नहीं रहा।
यह घटना मनुष्य को यह कठोर चेतावनी थी कि वह विज्ञान और तकनीक के दंभ में प्रकृति की शक्तियों को चुनौती न दे।
(च) आधुनिक फ्लैट संस्कृति और संवेदनहीनता का पराकाष्ठा
लेखक वर्तमान में मुंबई के उपनगर वर्सोवा में एक फ्लैट (अपार्टमेंट) में रहते हैं। वहाँ भी लेखक के फ्लैट के बरामदे (खिड़की) में कबूतर के एक जोड़े ने अपना घोंसला बना लिया था और उनके दो छोटे बच्चे थे। बड़े कबूतर दिनभर अपने बच्चों को दाना खिलाने के लिए खिड़की से बार-बार कमरे के भीतर आते-जाते थे।
इस आने-जाने के दौरान कभी कोई पुस्तक गिर जाती, कभी कोई कीमती सजावटी वस्तु टूट जाती और घर में गंदगी फैलती थी। इस परेशानी से तंग आकर लेखक की पत्नी ने खिड़की पर लोहे की मजबूत जाली लगवा दी और कबूतरों के आने का रास्ता सदा के लिए बंद कर दिया। कबूतर के बच्चों को बाहर निकाल दिया गया।
लेखक अत्यंत वेदना के साथ कहते हैं कि आज वे दोनों कबूतर खिड़की की बाहर की मुंडेर पर रातभर ठंड, हवा और सन्नाटे में उदास और असहाय बैठे रहते हैं। लेखक आत्म-चिंतन करते हुए प्रश्न उठाते हैं कि आज के इस स्वार्थी संसार में न तो हज़रत सुलेमान हैं जो इन पक्षियों की मूक भाषा को समझें, न पैगंबर नूह हैं जो इनके अपमान पर रोएँ, और न ही मेरी माँ हैं जो इनके आशियाने छिन जाने पर दिनभर का रोज़ा रखकर पश्चाताप करें। आज का मानव पूरी तरह आत्मकेंद्रित और संवेदनहीन हो चुका है।
3. NCERT पाठ्यपुस्तक अभ्यास: प्रश्न एवं संपूर्ण आदर्श उत्तर
(क) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर (25-30 शब्दों में) दीजिए:
Question 1. बड़े-बड़े बिल्डर समुद्र को पीछे क्यों धकेल रहे थे? (Page No. 89) [CBSE 2019, 2023]
Answer:
बड़े-बड़े बिल्डर अपने व्यावसायिक मुनाफे, अत्यधिक आर्थिक लाभ और बढ़ती आबादी के लिए रिहायशी बस्तियाँ बसाने के उद्देश्य से समुद्र के किनारे की ज़मीन पर कब्ज़ा कर रहे थे। वे समुद्र को पीछे धकेलकर उस पर कंक्रीट की बहुमंजिला इमारतें और सीमेंट के जंगल खड़े करना चाहते थे।
Question 2. लेखक का घर किस शहर में था और अब वह कहाँ रहता है? (Page No. 89)
Answer:
लेखक का पैतृक घर पहले ग्वालियर (मध्य प्रदेश) में था, जहाँ खुले आँगन, दालान और हरा-भरा प्राकृतिक वातावरण था। वर्तमान समय में लेखक महानगर मुंबई के उपनगर वर्सोवा के एक डिब्बेनुमा आधुनिक फ्लैट (अपार्टमेंट) में रहता है।
Question 3. जीवन कैसे घरों में सिमटने लगा है? (Page No. 89)
Answer:
पहले मनुष्य प्रकृति के खुले वातावरण, बड़े-बड़े दालानों, बाग-बगीचों और आँगन वाले विशाल घरों में मिल-जुलकर संयुक्त परिवारों में रहता था। परंतु आधुनिक नगरीकरण, अत्यधिक जनसंख्या और स्वार्थ के कारण आज मानव जीवन डिब्बेनुमा छोटे-छोटे फ्लैटों, एकल परिवारों और संकीर्ण कमरों में सिमटकर रह गया है।
Question 4. कबूतर परेशानी में इधर-उधर क्यों फड़फड़ा रहे थे? (Page No. 89) [CBSE 2020]
Answer:
कबूतर के जोड़े ने लेखक के घर के रोशनदान में दो अंडे दिए थे। एक अंडा बिल्ली ने झपटकर तोड़ दिया था और दूसरा अंडा बचाते समय लेखक की माँ के हाथ से फिसलकर फर्श पर गिरकर चकनाचूर हो गया था। अपने दोनों बच्चों (अंडों) के नष्ट हो जाने के असीम दुख, भय और विरह-वेदना के कारण कबूतर व्याकुल होकर इधर-उधर फड़फड़ा रहे थे।
(ख) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर (50-60 शब्दों में) दीजिए:
Question 5. अरब में लशकर को ‘नूह’ के नाम से क्यों याद किया जाता है? (Page No. 89) [BOARD FAVORITE / CBSE 2018, 2022]
Answer:
अरब में पैगंबर ‘अलफ़ज़ल’ को ‘नूह’ के नाम से याद किया जाता है, क्योंकि ‘नूह’ का शाब्दिक अर्थ होता है—’निरंतर विलाप करने वाला या जीवनभर रोने वाला’।
कारण:
एक बार उनके सामने से एक घायल और ज़ख्मी कुत्ता निकला, जिसे उन्होंने घृणावश दुत्कार दिया। कुत्ते ने दार्शनिक उत्तर देते हुए कहा कि न तो मैं अपनी इच्छा से कुत्ता बना हूँ और न तुम अपनी पसंद से इंसान बने हो; हम दोनों को बनाने वाला एक ही परमात्मा है।
कुत्ते की इस खरी बात से नूह को अपनी भूल, अहंकार और जीव-अपमान का इतना गहरा आघात लगा कि वे उस मूक प्राणी के प्रति किए गए दुर्व्यवहार के प्रायश्चित में जीवनभर ईश्वर के सम्मुख रोते रहे। इसी अपार करुणा और पश्चाताप के कारण उन्हें ‘नूह’ कहा गया।
Question 6. लेखक की माँ तीसरी मंजिल के रोशनदान में जाली लगाने के बाद भी क्यों दुखी थीं? (Page No. 89) [CBSE 2020, 2024]
Answer:
लेखक की पत्नी ने कबूतरों द्वारा घर गंदा किए जाने और बार-बार आने-जाने की परेशानी से तंग आकर खिड़की पर लोहे की जाली लगवा दी थी और उनके आने का रास्ता पूरी तरह बंद कर दिया था।
लेखक की माँ इसलिए अत्यधिक दुखी थीं क्योंकि:
- जाली लग जाने के कारण कबूतर बाहर खिड़की की मुंडेर पर रातभर ठंड, तेज़ हवा और अंधेरे में उदास, असहाय और बेबस बैठे रहते थे।
- माँ के भीतर यह गहरी संवेदनशीलता और अपराध-बोध था कि उन्होंने अपने स्वार्थ और सुविधा के लिए उन मूक पक्षियों का आशियाना छीनकर उन्हें बेघर और अनाथ कर दिया है। माँ को पक्षियों की यह लाचारी अंदर तक कचोटती थी।
Question 7. प्रकृति में आए असंतुलन का क्या परिणाम हुआ? (Page No. 89) [BOARD FAVORITE / CBSE 2023, 2024 HOTS]
Answer:
मनुष्य द्वारा पेड़ों की अंधाधुंध कटाई, वनों के विनाश, समुद्र के अतिक्रमण और असीमित प्रदूषण के कारण प्रकृति का संतुलन पूरी तरह बिगड़ गया है। इसके निम्नलिखित विनाशकारी और प्रलयंकारी परिणाम सामने आए हैं:
- ऋतु-चक्र का अनियंत्रित होना: गरमी के मौसम में अत्यधिक असह्य और झुलसाने वाली धूप पड़ना, शीत ऋतु का चक्र बिगड़ना, और बेवक्त व अनियंत्रित मूसलाधार बारिश होना।
- प्राकृतिक आपदाओं की बाढ़: भूकंप, चक्रवाती तूफ़ान, सैलाब (बाढ़), और सुनामी जैसी भयंकर आपदाओं का बार-बार आना।
- मूक जीवों का विस्थापन एवं विनाश: पशु-पक्षियों के प्राकृतिक आवास छिन जाने से उनका शहरों की ओर भटकना, विलुप्त होना और भोजन के लिए तरसना।
- मानव जीवन पर संकट: नए-नए असाध्य रोगों और महामारियों का फैलना तथा महानगरों का जलमग्न होना।
Question 8. लेखक की माँ सूर्य ढलने के बाद पेड़ों के पत्ते तोड़ने से क्यों मना करती थीं? (Page No. 89) [CBSE 2021]
Answer:
लेखक की माँ का यह दृढ़ और पवित्र विश्वास था कि प्रकृति के कण-कण, पेड़-पौधों और वनस्पतियों में भी इंसानों की तरह ही प्राण, संवेदनशीलता और भावनाएँ होती हैं। वे अपने बच्चों को सिखाती थीं कि:
- शाम ढलने (सूरज डूबने) के बाद पेड़ सोते और विश्राम करते हैं; उस समय उनके पत्ते तोड़ने से पेड़ दर्द से रोते हैं और बद्दुआ (शाप) देते हैं।
- दीया-बत्ती (संध्याकाल) के समय फूलों को नहीं तोड़ना चाहिए, अन्यथा वे दुखी होते हैं।
- दरिया (नदी) पर जाने पर उसे हाथ जोड़कर सलाम करना चाहिए क्योंकि वह जीवनदायिनी है, और कुत्तों-मुर्गों को कभी सताना नहीं चाहिए। माँ का यह दृष्टिकोण प्रकृति और जीव-जगत के प्रति अगाध श्रद्धा, कृतज्ञता और अहिंसा का प्रतीक था।
4. भाव एवं आशय स्पष्टीकरण (दीर्घ उत्तरीय प्रश्न)
Question 9. निम्नलिखित पंक्तियों का आशय स्पष्ट कीजिए:
(क) नेचर की सहनशक्ति की एक सीमा होती है। नेचर के गुस्से का एक नमूना कुछ साल पहले बंबई में देखने को मिला था। (Page No. 90) [CBSE 2022, 2024]
Answer:
आशय: प्रकृति (नेचर) स्वभाव से अत्यंत उदार, क्षमाशील, पोषक और धैर्यवान है। वह मनुष्य के सैकड़ों अत्याचार, प्रदूषण और दोहन को अपनी छाती में चुपचाप सहन करती रहती है। परंतु प्रकृति के इस धैर्य और सहनशीलता की भी एक अंतिम सीमा होती है।
जब मनुष्य अपने लोभ में अंधा होकर समुद्र का सीना चीरने लगता है और प्रकृति के अस्तित्व को मिटाने पर तुल जाता है, तो प्रकृति का रौद्र क्रोध भड़क उठता है। लेखक 26 जुलाई 2005 को मुंबई में आई विनाशकारी बाढ़ और सुनामी का उल्लेख करते हुए स्पष्ट करते हैं कि प्रकृति ने अपने भयानक क्रोध से समूचे महानगर को जलमग्न कर दिया था और तीन विशाल पानी के जहाजों को खिलौनों की तरह फेंक दिया था। यह घटना मानव को यह सबक सिखाती है कि प्रकृति के साथ खिलवाड़ करना आत्मघाती है।
(ख) जो जितना बड़ा होता है उसे उतना ही कम गुस्सा आता है, परंतु जब आता है तो संभालना मुश्किल हो जाता है। (Page No. 90)
Answer:
आशय: लेखक ने यहाँ समुद्र और प्रकृति की तुलना एक गंभीर, धीर, विशाल हृदय और क्षमाशील महापुरुष से की है। समुद्र इतना विशाल है कि वह मनुष्य के द्वारा फेंका गया कचरा, नालों की गंदगी और अतिक्रमण कई वर्षों तक मौन रहकर बर्दाश्त करता रहता है।
परंतु जब मनुष्य की धृष्टता और स्वार्थ अपनी सभी सीमाएँ लाँघ जाता है और वह समुद्र को ही पीछे धकेलने लगता है, तो समुद्र का सुप्त क्रोध प्रचंड वेग से बाहर आता है। उस असीम प्राकृतिक शक्ति के रौद्र रूप और प्रलयंकारी थपेड़ों को संसार की कोई भी आधुनिक तकनीक, विज्ञान या मानवीय सेना संभाल नहीं पाती।
(ग) मिट्टी से मिट्टी मिले, खोके सभी निशान,
किसमें कितना कौन है, कैसे हो पहचान? (Page No. 90) [BOARD EXAM FAVORITE]
Answer:
आशय: निदा फ़ाज़ली के इस दोहे में समूचे ब्रह्मांड और जीवन का सर्वोच्च दार्शनिक और आध्यात्मिक सत्य समाहित है। इस सृष्टि के समस्त प्राणी (इंसान, पशु, पक्षी, कीट-पतंगे) पंचतत्वों (विशेषकर मिट्टी) से मिलकर बने हैं। मृत्यु के उपरांत सभी का नश्वर शरीर उसी एक मिट्टी में विलीन होकर एकाकार हो जाता है और सारे सांसारिक नाम, पद, जाति और पहचान के निशान मिट जाते हैं।
मिट्टी में मिल जाने के बाद यह भेद करना सर्वथा असंभव है कि इसमें से कौन-सी मिट्टी हिंदू की थी, कौन-सी मुस्लिम की, कौन अमीर था, कौन गरीब, अथवा कौन मनुष्य था और कौन पशु। जब परमपिता परमात्मा ने सबको एक ही मिट्टी से गढ़ा है और अंततः सबको उसी मिट्टी में समाना है, तो फिर जीवित रहते हुए जाति, धर्म, प्रजाति और अहंकार के आधार पर भेद-भाव व नफरत करना सर्वथा अज्ञानता, व्यर्थ और अमानवीय है।
5. भाषा अध्ययन एवं व्यावहारिक व्याकरण
Question 10. निम्नलिखित वाक्यों को निर्देशानुसार रूपांतरित कीजिए:
- कबूतर परेशानी में इधर-उधर फड़फड़ा रहे थे। (संयुक्त वाक्य में बदलिए)
- उत्तर: कबूतर अत्यंत परेशान थे और वे इधर-उधर फड़फड़ा रहे थे।
- समुद्र के किनारे कंक्रीट की बस्तियाँ बसने से परिंदे बेघर हो गए। (मिश्र वाक्य में बदलिए)
- उत्तर: जैसे ही समुद्र के किनारे कंक्रीट की बस्तियाँ बसीं, वैसे ही परिंदे बेघर हो गए।
- लेखक की माँ ने अनजाने में हुए पाप का प्रायश्चित करने के लिए दिनभर रोज़ा रखा। (सरल वाक्य में बदलिए)
- उत्तर: लेखक की माँ ने प्रायश्चित स्वरूप दिनभर का रोज़ा रखा।
- जो जितना बड़ा होता है, उसे उतना ही कम गुस्सा आता है। (सरल वाक्य में बदलिए)
- उत्तर: बड़े व्यक्ति को बहुत कम गुस्सा आता है।
Question 11. पाठ में प्रयुक्त निम्नलिखित तत्सम, तद्भव और विदेशी (उर्दू, फ़ारसी, अंग्रेज़ी) शब्दों का तालिकाबद्ध वर्गीकरण कीजिए:
| तत्सम शब्द | तद्भव शब्द | अरबी-फ़ारसी (उर्दू) शब्द | अंग्रेज़ी शब्द |
| सहनशक्ति | आँगन | लश्कर | बिल्डर |
| असंतुलन | घोंसला | रहमत | फ्लैट |
| आवास | रोटी | मुसीबत | स्टूल |
| प्रायश्चित | दरिया | रोज़ा | अपार्टमेंट |
| संवेदना | कुत्ता | नमाज़ | ट्रैफिक |
6. 15 उच्च-स्तरीय बोर्ड परीक्षा मॉडल प्रश्न (CBSE HOTS, Case Study & FAQs)
Question 1. ‘अब कहाँ दूसरे के दुख से दुखी होने वाले’ पाठ के शीर्षक की सार्थकता और व्यंजना को स्पष्ट कीजिए। [CBSE 2023]
Answer: यह शीर्षक समकालीन समाज के नैतिक पतन, मानवीय संवेदनाओं के ह्रास और चरम स्वार्थपरता पर अत्यंत तीखा और विचारोत्तेजक व्यंग्य है। लेखक यह प्रतिपादित करता है कि प्राचीन काल में हज़रत सुलेमान, पैगंबर नूह और लेखक की माँ जैसे लोग थे जो चींटियों, कुत्तों और कबूतरों के दुख में भी रो पड़ते थे। परंतु आज का मनुष्य इतना आत्मकेंद्रित हो गया है कि उसे अपने स्वार्थ के आगे न तो पड़ोसियों की चिंता है और न ही प्रकृति और मूक जीवों की। अतः यह शीर्षक मानवीय संवेदनाओं के लोप की ओर सटीक संकेत करता है।
Question 2. हज़रत सुलेमान के चरित्र से आज के शक्तिशाली राष्ट्रों और राजनेताओं को क्या सीख लेनी चाहिए? [HOTS]
Answer: हज़रत सुलेमान के चरित्र से यह सीख मिलती है कि सच्ची शक्ति का प्रमाण दूसरों पर प्रभुत्व जमाना या कमजोरों को कुचलना नहीं, बल्कि उनकी रक्षा करना और उनके प्रति विनम्र होना है। आज के शक्तिशाली देशों को दुर्बल देशों और पर्यावरण का शोषण करने के बजाय सुलेमान की भाँति संरक्षक और दयालु (रहमत) बनना चाहिए।
Question 3. पैगंबर नूह को कुत्ते द्वारा दी गई सीख का आधुनिक जातिवादी और संकीर्ण समाज में क्या महत्त्व है?
Answer: कुत्ते की यह सीख कि—“सबको बनाने वाला एक ही परमात्मा है”—आज के जाति, धर्म, रंग और नस्ल के आधार पर विभाजित समाज के लिए अत्यंत प्रासंगिक है। यह सीख हमें याद दिलाती है कि बाहरी आवरण या जन्म के आधार पर किसी भी प्राणी या मनुष्य को हीन या अछूत समझना ईश्वर की रचना का अपमान करना है।
Question 4. ‘डेरा डालना’ मुहावरे का पाठ में प्रयुक्त दोनों संदर्भों में क्या लाक्षणिक अर्थ है?
Answer:
- मनुष्यों के संदर्भ में: समुद्र और जंगलों की ज़मीन पर कब्ज़ा करके कंक्रीट की बस्तियाँ और फ्लैट बनाकर स्थायी रूप से बस जाना (अतिक्रमण करना)।
- पक्षियों के संदर्भ में: जब उनके प्राकृतिक पेड़ और घोंसले काट दिए गए, तो लाचार होकर पक्षियों द्वारा इंसानों के घरों, बालकनियों और रोशनदानों में मजबूरी में शरण (अस्थायी बसेरा) लेना।
Question 5. समुद्र ने अपने क्रोध में जिन तीन जहाजों को फेंका था, वे कहाँ-कहाँ गिरे और यह किस बात का प्रतीक था? [CBSE 2022]
Answer:
- पहला जहाज़ वर्ली के समुद्र तट पर औंधे मुँह गिरा।
- दूसरा जहाज़ बांद्रा में कार्टर रोड के पत्थरों पर चकनाचूर होकर गिरा।
- तीसरा जहाज़ जुहू के समुद्र किनारे सैलानियों के बीच फँस गया।यह इस बात का साक्षात प्रतीक था कि मनुष्य द्वारा निर्मित आधुनिक विज्ञान और विशाल जहाज प्रकृति के असीम वेग के सम्मुख तिनके के समान तुच्छ और असहाय हैं।
Question 6. लेखक की माँ द्वारा कबूतर का अंडा टूटने पर दिनभर रोज़ा रखना उनकी किस मानसिकता को दर्शाता है?
Answer: यह उनकी चरम जीव-दया, अहिंसा, गहरी धार्मिक शुचिता और मूक प्राणियों के प्रति मातृत्व भाव को दर्शाता है। वे अनजाने में हुई भूल को भी एक गंभीर नैतिक पाप मानती थीं और ईश्वर के सम्मुख आत्म-समर्पण कर अपने अंतःकरण को शुद्ध करना चाहती थीं।
Question 7. कंक्रीट के बहुमंजिला भवनों और अंधाधुंध शहरीकरण ने पक्षियों के जीवन को किस प्रकार तबाह कर दिया है?
Answer: अंधाधुंध शहरीकरण के कारण:
- पक्षियों के प्राकृतिक पेड़ और घोंसले नष्ट हो गए हैं, जिससे उनका वंश-वृद्धि चक्र बाधित हुआ है।
- वे शहरों में भोजन और आश्रय की तलाश में भटकते हैं, जहाँ खिड़कियों पर लगी जालियों के कारण वे चोटिल होते हैं और भूख-प्यास से मर जाते हैं।
- अनेक दुर्लभ प्रजातियाँ शहरों से हमेशा के लिए पलायन कर चुकी हैं या विलुप्त हो चुकी हैं।
Question 8. ‘संसार एक परिवार के समान था’—इस कथन का ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संदर्भ क्या है? [CBSE 2020]
Answer: इसका सांस्कृतिक संदर्भ भारतीय संस्कृति के ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ (समूची पृथ्वी ही एक परिवार है) के उदात्त सिद्धांत से है। ऐतिहासिक रूप से पहले मनुष्य, पशु, पक्षी, वन और नदियाँ एक-दूसरे के पूरक बनकर रहते थे। कोई किसी के प्राकृतिक अधिकारों का हनन नहीं करता था और सभी का सह-अस्तित्व सुरक्षित था।
Question 9. अभिकथन (A) और तर्क (R) आधारित प्रश्न:
अभिकथन (A): आधुनिक युग में प्राकृतिक आपदाओं (भूकंप, सुनामी, अत्यधिक गर्मी) की आवृत्ति बहुत बढ़ गई है।
तर्क (R): मनुष्य ने अपने लोभ के कारण पेड़ों की अंधाधुंध कटाई और समुद्र का अतिक्रमण करके प्रकृति के संतुलन को बिगाड़ दिया है।
(क) A और R दोनों सही हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
(ख) A और R दोनों सही हैं, परंतु R, A की सही व्याख्या नहीं है।
(ग) A सही है, परंतु R गलत है।
(घ) A गलत है, परंतु R सही है।
Answer: (क) A और R दोनों सही हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
स्पष्टीकरण: मानव द्वारा किया गया अनियंत्रित दोहन और पर्यावरण असंतुलन ही प्राकृतिक आपदाओं के निरंतर आने का प्रत्यक्ष और वैज्ञानिक कारण है।
Question 10. निदा फ़ाज़ली की संस्मरणात्मक गद्य-शैली की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
Answer:
- सरल एवं प्रवाहमयी भाषा: हिंदी, उर्दू और देशज मुहावरों का अत्यंत कर्णप्रिय और सहज मिश्रण।
- दार्शनिक गहराई: दैनिक जीवन की छोटी-छोटी घटनाओं और लोक-कथाओं से गंभीर दार्शनिक निष्कर्ष निकालना।
- भावुकता और व्यंग्य का संगम: पुरानी पीढ़ी की करुणा के प्रति सम्मान और आधुनिक समाज की संवेदनहीनता पर तीखा कटाक्ष।
Question 11. लेखक की पत्नी द्वारा खिड़की में जाली लगाना आधुनिक समाज की किस मजबूरी और विसंगति को प्रकट करता है?
Answer: यह आधुनिक फ्लैट संस्कृति की उस मजबूरी और विसंगति को प्रकट करता है जहाँ स्थान की कमी और अति-व्यस्तता के कारण मनुष्य मूक जीवों की स्वाभाविक उपस्थिति को भी ‘गंदगी और व्यवधान’ मानने लगता है। यह दिखाता है कि आधुनिक जीवन-शैली ने मनुष्य को अपनी ही सुख-सुविधाओं का कैदी बना दिया है।
Question 12. ‘पर्यावरण संरक्षण’ के दृष्टिकोण से इस पाठ से हमें क्या व्यावहारिक कदम उठाने की प्रेरणा मिलती है? [Value-Based]
Answer:
- अंधाधुंध वनों की कटाई और समुद्रों व नदियों के अतिक्रमण पर तत्काल प्रभाव से कड़ा कानूनी प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए।
- नगरों में अधिक से अधिक वृक्षारोपण किया जाना चाहिए।
- अपने घरों की छतों और बालकनियों में पक्षियों के लिए दाना-पानी और सुरक्षित घोंसलों की व्यवस्था करनी चाहिए।
Question 13. क्या प्रकृति के क्रोध से मनुष्य अपनी आधुनिक तकनीक और दौलत के बल पर बच सकता है? तर्क दीजिए।
Answer: कदापि नहीं। पाठ में वर्णित सुनामी की घटना यह प्रमाणित करती है कि जब प्रकृति का संतुलन बिगड़ता है, तो मनुष्य के बड़े-बड़े बाँध, कंक्रीट की बहुमंजिला इमारतें और विशालकाय जहाज़ ताश के पत्तों की तरह ढह जाते हैं। मनुष्य प्रकृति का स्वामी नहीं बल्कि उसका एक अंग है; अतः वह केवल प्रकृति के साथ समन्वय बनाकर ही सुरक्षित रह सकता है।
Question 14. केस स्टडी प्रश्न (Case Study Scenario):
एक हाउसिंग सोसाइटी में पेड़ों पर पक्षियों के चहचहाने और छज्जों पर बीट करने से तंग आकर सोसाइटी की प्रबंध समिति सभी हरे-भरे पेड़ों को जड़ से काटने और परिंदों को भगाने का प्रस्ताव पारित करती है।
निदा फ़ाज़ली के पाठ ‘अब कहाँ दूसरे के दुख से दुखी होने वाले’ के आधार पर सोसाइटी प्रबंधन के इस निर्णय का समालोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए और उचित समाधान सुझाइए।
Answer: सोसाइटी प्रबंधन का यह निर्णय पूर्णतः अदूरदर्शी, क्रूर, अमानवीय और पर्यावरण-विरोधी है।
- पाठ के अनुसार, यह धरती केवल मनुष्यों की नहीं है; पक्षियों का भी इस पर बराबर का अधिकार है। पक्षियों के प्राकृतिक आशियाने उजाड़ना पारिस्थितिकीय असंतुलन और पाप को जन्म देता है।
- समाधान: पेड़ों को काटने के स्थान पर सोसाइटी को स्वच्छता के अन्य उपाय (जैसे जालीदार शेड्स या नियमित सफाई) करने चाहिए तथा पक्षियों के सह-अस्तित्व का सम्मान करते हुए उनके संरक्षण हेतु विशेष बर्ड-फीडर ज़ोन बनाने चाहिए।
Question 15. इस संपूर्ण निबंध से समूची मानव सभ्यता को क्या सर्वोच्च और शाश्वत संदेश प्राप्त होता है?
Answer: इस पाठ का सर्वोच्च और शाश्वत संदेश ‘जियो और जीने दो’ तथा ‘सह-अस्तित्व (Co-existence)’ है। मनुष्य को अपनी संकीर्ण स्वार्थपरता, अहंकार और लोभ का त्याग करके प्रकृति, पशु-पक्षियों और साथी मनुष्यों के दुख-दर्द के प्रति संवेदनशील, दयालु और कृतज्ञ होना चाहिए; क्योंकि दूसरों के दुख को अपना समझना ही सच्ची मानवता है।
7. CONCLUDING BOARD TOPPER STRATEGY
सीबीएसई कक्षा 10 हिंदी ‘ब’ की बोर्ड परीक्षा में ‘अब कहाँ दूसरे के दुख से दुखी होने वाले’ अध्याय से शत-प्रतिशत अंक प्राप्त करने हेतु विशेष परीक्षा ब्लूप्रिंट:
- तीनों ऐतिहासिक व पौराणिक उदाहरणों का सही उल्लेख: उत्तर लिखते समय हज़रत सुलेमान (चींटियों का प्रसंग), पैगंबर नूह (घायल कुत्ते का प्रसंग), तथा लेखक की माँ (कबूतर के अंडों का प्रसंग) के संदर्भों का सटीक और संक्षिप्त उल्लेख अवश्य करें और मुख्य शब्दों को रेखांकित करें।
- प्रकृति असंतुलन के बिंदुवार दुष्परिणाम: जब भी पर्यावरण प्रदूषण या असंतुलन का प्रश्न आए, तो उत्तर को (क) ऋतु-चक्र का अनियंत्रित होना, (ख) प्राकृतिक आपदाएँ (सुनामी, भूकंप, बाढ़), (ग) मूक जीवों का विस्थापन, तथा (घ) असाध्य बीमारियाँ जैसे स्पष्ट उप-शीर्षकों में प्रस्तुत करें।
- दोहे का दार्शनिक निष्कर्ष: दीर्घ उत्तरीय प्रश्नों के उत्तर के समापन में निदा फ़ाज़ली के अमर दोहे (“मिट्टी से मिट्टी मिले, खोके सभी निशान…”) का भावार्थ लिखें, जिससे परीक्षक पर असाधारण सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।
- भाषा एवं वर्तनी की शुद्धता: ‘पारिस्थितिकीय’, ‘असंतुलन’, ‘सुलेमान’, ‘प्रायश्चित’, ‘संवेदनहीनता’ जैसे तत्सम व मानक शब्दों की वर्तनी शुद्ध लिखें।
