NCERT Solutions Class 10 Hindi स्पर्श कविता 3: मनुष्यता

NCERT Solutions for Class 10 Hindi स्पर्श (भाग-2) कविता 3: मनुष्यता (मैथिलीशरण गुप्त)

1. SEO STRATEGY INTRODUCTION & CHAPTER MASTER OVERVIEW

राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित कविता ‘मनुष्यता’ सीबीएसई (CBSE) कक्षा 10 हिंदी पाठ्यक्रम ‘ब’ (Course B) की पाठ्यपुस्तक ‘स्पर्श भाग-2’ के काव्य-खंड का एक अत्यंत विचारोत्तेजक और दार्शनिक अध्याय है। बोर्ड परीक्षा के दृष्टिकोण से इस पाठ से काव्य-सौंदर्य, पौराणिक संदर्भों का विश्लेषण, आशय स्पष्टीकरण, तथा मूल्यपरक दीर्घ उत्तरीय प्रश्न निरंतर पूछे जाते हैं।

इस कविता का मूल प्रतिपाद्य सच्ची मानवता, परोपकार, विश्व-बंधुत्व, त्याग और सहानुभूति की प्रतिष्ठा करना है। कवि के अनुसार केवल साँसें लेना और अपना स्वार्थ पूरा करना तो पशु-प्रवृत्ति है, क्योंकि पशु केवल अपने चरने की चिंता करता है। सच्चा मनुष्य वही है जो समस्त मानव जाति के कल्याण के लिए जिए और दूसरों के हित के लिए सहर्ष अपना सर्वस्व बलिदान कर दे। ऐसी परोपकारी मृत्यु ही ‘सुमृत्यु’ कहलाती है, जिसे मृत्यु के बाद भी युगों-युगों तक संसार याद रखता है

कविता की भाषा खड़ी बोली हिंदी है, जिसमें संस्कृतनिष्ठ तत्सम शब्दावली (जैसे—मर्त्य, सुमृत्यु, क्षुधार्त, परार्थ, अंतराैक्य) का ओजस्वी प्रयोग हुआ है। गुप्त जी ने रंतिदेव, दधीचि, उशीनर (राजा शिबि) और दानवीर कर्ण जैसे महान पौराणिक और ऐतिहासिक चरित्रों के प्रेरक उदाहरण देकर निस्वार्थ त्याग के शाश्वत महत्त्व को उजागर किया है

मास्टर सारांश सारणी: ‘मनुष्यता’ कविता के प्रमुख स्तंभ एवं पौराणिक संदर्भ

काव्यांश संदर्भकेंद्रीय विषय / विचारपौराणिक पात्र एवं संदर्भव्यावहारिक व नैतिक संदेश
काव्यांश 1नश्वर जीवन और सुमृत्यु की परिभाषामृत्यु से न डरकर ऐसा परोपकारी जीवन जिएँ कि मृत्यु के बाद भी संसार याद रखे
काव्यांश 2उदारता एवं विश्व-चेतनाजो समस्त संसार में आत्मीयता का प्रसार करता है, सरस्वती और प्रकृति भी उसका यश गाती हैं
काव्यांश 3देह-दान और परोपकार की पराकाष्ठा• राजा रंतिदेव (थाल दान)
• महर्षि दधीचि (अस्थि-दान)
• उशीनर क्षितीश/शिबि (मांस-दान)
• दानवीर कर्ण (कुंडल-कवच दान)
नश्वर देह की चिंता छोड़कर परोपकार के लिए सर्वस्व त्याग देना ही अमरता की कुंजी है
काव्यांश 4करुणा, सहानुभूति और महाविभूतिमहात्मा बुद्ध का लोक-कल्याण (करुणा)दया और करुणा ही संसार की सबसे बड़ी शक्ति (महाविभूति) है; इससे सारा जग वशीभूत हो जाता है।
काव्यांश 5धन का घमंड न करनात्रिलोकीनाथ का सान्निध्यतुच्छ धन-संपत्ति के मद में अहंकारी न बनें; संसार में कोई अनाथ नहीं है, ईश्वर सबके रक्षक हैं
काव्यांश 6विश्व-बंधुत्व और आंतरिक एकतापुराणपुरुष स्वयंभू (एक पिता)कर्मफल के आधार पर बाह्य भेद अवश्य हैं, परंतु आत्मा के स्तर पर सभी मनुष्य एक ही पिता की संतान हैं
काव्यांश 7परस्पर सहयोग एवं देवत्व-प्राप्तिअंतरिक्ष के देवता (अमर्त्य-अंक)एक-दूसरे का हाथ थामकर आगे बढ़ें; निष्कलंक होकर देवताओं की गोद में स्थान पाएँ
काव्यांश 8एकता के साथ लक्ष्य की ओर बढ़नाअभीष्ट मार्ग पर चलनाबिना किसी तर्क-वितर्क और भेदभाव के परस्पर मेल-जोल बढ़ाकर अपने जीवन-लक्ष्य को प्राप्त करें

2. NCERT पाठ्यपुस्तक अभ्यास: प्रश्न एवं आदर्श उत्तर

Question 1. कवि ने कैसी मृत्यु को ‘सुमृत्यु’ कहा है? (Page No. 25) [CBSE 2019, 2023]

Answer: कवि मैथिलीशरण गुप्त जी के अनुसार, ‘सुमृत्यु’ (सार्थक व श्रेष्ठ मृत्यु) वह मृत्यु है, जो परोपकार, जनकल्याण और निस्वार्थ सेवा के मार्ग पर चलते हुए प्राप्त होती है। साधारण मनुष्य का जन्म और मरण केवल अपने स्वार्थ तक सीमित रहता है, जिसे संसार शीघ्र ही भुला देता है

परंतु जो मनुष्य अपने जीवन को दूसरों की भलाई, सामाजिक उत्थान और मानवता की रक्षा के लिए समर्पित कर देता है, उसकी मृत्यु व्यर्थ नहीं जाती। ऐसा व्यक्ति भले ही भौतिक रूप से नश्वर संसार से चला जाए, किंतु अपने महान कर्मों, त्याग और यश के रूप में वह युगों-युगों तक जनमानस की स्मृतियों में जीवित रहता है। कवि ने इसी अमर गौरवमयी मृत्यु को ‘सुमृत्यु’ कहा है

Question 2. उदार व्यक्ति की पहचान कैसे होती है? (Page No. 25) [CBSE 2020, 2022]

Answer:

कविता के आधार पर एक उदार व्यक्ति की पहचान निम्नलिखित उदात्त गुणों से होती है:

  • अखंड आत्म-भाव: उदार व्यक्ति समस्त संसार और समस्त प्राणियों को अपना ही विस्तार समझता है तथा ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की भावना को हृदय में धारण करता है।
  • निस्वार्थ परोपकार: वह अपने व्यक्तिगत स्वार्थों से ऊपर उठकर सदा दीनों, दुखियों और असहायों की सहायता के लिए तत्पर रहता है।
  • सृष्टि और विद्या द्वारा वंदनीय: ऐसे उदार मनुष्य का गुणगान स्वयं सरस्वती (पुस्तकों और इतिहास) में करती हैं, पृथ्वी उसके प्रति कृतज्ञता प्रकट करती है और समस्त संसार उसकी पूजा करता है।

Question 3. कवि ने दधीचि, कर्ण आदि महान व्यक्तियों का उदाहरण देकर ‘मनुष्यता’ के लिए क्या संदेश दिया है? (Page No. 25) [BOARD EXAM FAVORITE / CBSE 2023]

Answer: कवि ने पौराणिक महापुरुषों के प्रेरक उदाहरण देकर यह स्पष्ट संदेश दिया है कि यह भौतिक शरीर नश्वर (क्षणभंगुर) है, जबकि परोपकार और त्याग अमर हैं

कवि ने निम्नलिखित उदाहरणों द्वारा त्याग का आदर्श प्रस्तुत किया है:

  1. परम दानी रंतिदेव: जिन्होंने भूख से अत्यंत व्याकुल (क्षुधार्त) होने के बावजूद अपने भोजन की अंतिम थाली भी एक याचक को सहर्ष दान कर दी।
  2. महर्षि दधीचि: जिन्होंने देवासुर संग्राम में देवताओं और लोक-कल्याण की रक्षा हेतु अपनी अस्थियों (हड्डियों) का दान देकर वज्र का निर्माण कराया।
  3. उशीनर नरेश (राजा शिबि): जिन्होंने एक असहाय कबूतर की जान बचाने के लिए अपने शरीर का मांस काट-काटकर दान कर दिया।
  4. वीर कर्ण: जिन्होंने ब्राह्मण वेशधारी इंद्र को अपने जीवन-रक्षक जन्मजात कुंडल और स्वर्ण-कवच हँसते-हँसते दान में दे दिए।

इन उदाहरणों से कवि संदेश देते हैं कि जब यह शरीर अंततः नष्ट ही होना है, तो फिर इस नश्वर देह के प्रति मोह त्यागकर मानवता और दूसरों के हित के लिए सर्वस्व न्योछावर करने से कभी पीछे नहीं हटना चाहिए

Question 4. कवि ने किन पंक्तियों में व्यक्त किया है कि हमें गर्व-रहित जीवन व्यतीत करना चाहिए? (Page No. 25)

Answer: कवि ने निम्नलिखित पंक्तियों में यह व्यक्त किया है कि मनुष्य को धन-दौलत के घमंड से दूर रहकर अहंकार-रहित जीवन जीना चाहिए:

“रहो न भूल के कभी मदांध तुच्छ वित्त में,

सनाथ जान आपको करो न गर्व चित्त में।

अनाथ कौन है यहाँ? त्रिलोकीनाथ साथ हैं,

दयालु दीनबंधु के बड़े विशाल हाथ हैं।”

इन पंक्तियों के माध्यम से कवि समझाते हैं कि सांसारिक धन अत्यंत तुच्छ है, अतः इसके मद में चूर होकर स्वयं को सनाथ (सुरक्षित) मानकर कभी गर्व नहीं करना चाहिए, क्योंकि ईश्वर सदा सबके रक्षक हैं

Question 5. ‘मनुष्य मात्र बंधु है’ से आप क्या समझते हैं? स्पष्ट कीजिए। (Page No. 25) [CBSE 2022, 2024]

Answer: ‘मनुष्य मात्र बंधु है’ का अर्थ यह है कि संसार के समस्त मनुष्य आपस में सहोदर भाई-भाई हैं। हम सभी का सृष्टिकर्ता, परमपिता और आदि-स्रोत एक ही ‘स्वयंभू पुराणपुरुष’ (परमात्मा) है

यद्यपि मनुष्य अपने-अपने कर्मों के फल के अनुसार बाह्य रूप से भिन्न-भिन्न जातियों, धर्मों, रंगों और देशों में विभाजित दिखाई देते हैं, परंतु हमारे भीतर प्रवाहित आत्म-तत्त्व और प्राण-चेतना (अंतराैक्य) पूर्णतः एक समान है। यह ज्ञान ही मानव का सबसे बड़ा ‘विवेक’ है। अतः एक भाई का दूसरे भाई के काम न आना और उसके कष्टों का निवारण न करना सबसे बड़ा अनर्थ और अमानवीयता है

Question 6. कवि ने सबको एक होकर चलने की प्रेरणा क्यों दी है? (Page No. 25)

Answer:

कवि ने सबको परस्पर मेल-जोल और एकता के साथ चलने की प्रेरणा इसलिए दी है क्योंकि:

  • सच्ची प्रगति और सफलता: जब सभी मनुष्य परस्परावलंब (एक-दूसरे का सहारा बनकर) आगे बढ़ते हैं, तो जीवन-मार्ग की बड़ी से बड़ी विपत्तियाँ और बाधाएँ स्वतः दूर हो जाती हैं।
  • भेदभाव और कलह की समाप्ति: एकता से समाज में वर्ग-भेद, ईर्ष्या, वैमनस्य और संकीर्णता का अंत होता है।
  • समग्र मानवता का उत्थान: कवि का मानना है कि सच्चा समर्थ भाव वही है, जहाँ व्यक्ति केवल अपना उद्धार न करे, बल्कि पूरे समाज को तारते हुए स्वयं भी तरे।

Question 7. व्यक्ति को किस प्रकार का जीवन व्यतीत करना चाहिए? इस कविता के आधार पर लिखिए। (Page No. 25)

Answer: ‘मनुष्यता’ कविता के आधार पर व्यक्ति को निम्नलिखित आदर्शों से युक्त जीवन व्यतीत करना चाहिए:

  • परोपकारी और सेवाभावी: मनुष्य को केवल अपने हित की चिंता (पशु-प्रवृत्ति) छोड़कर दूसरों के सुख-दुख में सहभागी बनना चाहिए।
  • अहंकार-शून्य: धन, पद और झूठी प्रतिष्ठा के नशे (मद) से दूर रहकर हृदय में करुणा और दीनबंधु ईश्वर के प्रति निष्ठा रखनी चाहिए।
  • उदार और संवेदनशील: समस्त मानव जाति को अपना भाई मानते हुए त्याग और आत्म-बलिदान के लिए सदा तत्पर रहना चाहिए।
  • सकारात्मक और साहसी: जीवन के अभीष्ट मार्ग पर हँसते-खेलते हुए और संकटों को साहसपूर्वक झेलते हुए निरंतर आगे बढ़ना चाहिए।

Question 8. ‘मनुष्यता’ कविता के माध्यम से कवि क्या संदेश देना चाहता है? (Page No. 25) [CBSE 2020, 2024 HOTS]

Answer: मैथिलीशरण गुप्त जी ‘मनुष्यता’ कविता के माध्यम से समाज को यह सर्वोच्च सार्वभौमिक संदेश देना चाहते हैं कि मानव जीवन की सार्थकता केवल जैविक रूप से जीवित रहने में नहीं, बल्कि मानवीय मूल्यों को आत्मसात करने में है

कवि संदेश देते हैं कि:

  1. मनुष्य को संकीर्ण स्वार्थपरता त्यागकर विश्व-कल्याण के लिए कार्य करना चाहिए।
  2. सहानुभूति, दया और करुणा ही मनुष्य की वास्तविक पूँजी (महाविभूति) हैं, जिनसे संपूर्ण विश्व को जीता जा सकता है।
  3. हमें जाति, वर्ग और संप्रदाय की कृत्रिम दीवारों को गिराकर ‘विश्व-बंधुत्व’ (Universal Brotherhood) की स्थापना करनी चाहिए।
  4. जीवन ऐसा होना चाहिए कि मृत्यु के बाद भी हमारा यश और परोपकार समाज का मार्गदर्शन करता रहे।

3. भाव एवं आशय स्पष्टीकरण

Question 9. निम्नलिखित पंक्तियों का भाव स्पष्ट कीजिए:

(क) सहानुभूति चाहिए, महाविभूति है वही,

वशीकृता सदैव है बनी हुई मही।

विरुद्धवाद बुद्ध का दया-प्रवाह में बहा,

विनीत लोकवर्ग क्या न सामने झुका रहा? (Page No. 25)

Answer:

भावार्थ:

कवि कहते हैं कि मनुष्य के भीतर दूसरों के दुख-दर्द को समझने की ‘सहानुभूति’ और संवेदनशीलता होनी चाहिए। यही मानवीय गुण संसार की सबसे बड़ी संपत्ति (महाविभूति) है। जिस व्यक्ति में सच्ची करुणा होती है, उसके प्रेम और सेवा-भाव के वशीभूत यह पूरी पृथ्वी (मही) और संपूर्ण सृष्टि हो जाती है।

कवि महात्मा बुद्ध का ऐतिहासिक उदाहरण देते हुए कहते हैं कि बुद्ध के समय में समाज में अनेक रूढ़ियाँ और पाखंड व्याप्त थे, जिन्होंने बुद्ध के विचारों का तीव्र विरोध किया। परंतु बुद्ध ने अपने प्रेम, दया और करुणा के अपार प्रवाह में समस्त विरोध को बहा दिया। अंततः संपूर्ण लोकवर्ग उनके पावन चरणों में नतमस्तक हो गया। अतः प्रेम और सहानुभूति से ही संसार को जीता जा सकता है।

(ख) रहो न भूल के कभी मदांध तुच्छ वित्त में,

सनाथ जान आपको करो न गर्व चित्त में।

अनाथ कौन है यहाँ? त्रिलोकीनाथ साथ हैं,

दयालु दीनबंधु के बड़े विशाल हाथ हैं। (Page No. 25)

Answer: भावार्थ: इन पंक्तियों में कवि मनुष्य को सांसारिक धन के अहंकार से बचने की गंभीर चेतावनी देते हैं। कवि कहते हैं कि धन-संपत्ति अत्यंत नश्वर और ‘तुच्छ’ है, अतः इसके मद में कभी अंधे होकर यह घमंड न करें कि आप ‘सनाथ’ (धन और परिजनों से सुरक्षित) हैं

इस संसार में कोई भी व्यक्ति अनाथ और असहाय नहीं है, क्योंकि तीनों लोकों के स्वामी परमपिता परमेश्वर (त्रिलोकीनाथ) सदा प्रत्येक प्राणी की रक्षा के लिए उपस्थित हैं। उस परम कृपालु दीनबंधु के हाथ इतने विशाल हैं कि वे हर असहाय को अपनी छत्रछाया प्रदान करते हैं। अतः मनुष्य को अपने मन से घमंड का सर्वथा त्याग कर देना चाहिए

(ग) चलो अभीष्ट मार्ग में सहर्ष खेलते हुए,

विपत्ति, विघ्न जो पड़ें उन्हें ढकेलते हुए।

घटे न हेलमेल हाँ, बढ़े न भिन्नता कभी,

अतर्क एक पंथ के सतर्क पंथ हों सभी। (Page No. 25)

Answer: भावार्थ: कवि सभी मनुष्यों को अपने-अपने निर्धारित जीवन-लक्ष्य (अभीष्ट मार्ग) की ओर प्रसन्नतापूर्वक और हँसते-खेलते निरंतर अग्रसर होने का आह्वान करते हैं। मार्ग में आने वाली सभी विपत्तियों, रुकावटों और संकटों को साहसपूर्वक पीछे धकेलते हुए आगे बढ़ना चाहिए

इस यात्रा के दौरान मनुष्यों के बीच का पारस्परिक प्रेम, सौहार्द और हेलमेल कभी कम नहीं होना चाहिए और न ही संकीर्ण मतभेदों की भिन्नता बढ़नी चाहिए। बिना किसी व्यर्थ के तर्क-वितर्क (अतर्क) के, सभी पथिकों को एक होकर, एक ही लक्ष्य की प्राप्ति हेतु सावधानी और सजगता (सतर्क पंथ) के साथ आगे बढ़ते रहना चाहिए

4. भाषा अध्ययन एवं व्याकरणिक शब्द-संपदा

Question 10. निम्नलिखित शब्दों के विलोम शब्द लिखिए:

मूल शब्दविलोम शब्द
मर्त्यअमर्त्य / अमर
सुमृत्युकुमृत्यु / अपमृत्यु
उदारअनुदार / संकीर्ण / कृपण
सनाथअनाथ
परार्थस्वार्थ
अधीरधीर / धैर्यवान
प्रवृत्तनिवृत्त
भिन्नताअभिन्नता / एकता

Question 11. निम्नलिखित शब्दों के दो-दो पर्यायवाची शब्द लिखिए:

शब्दपर्यायवाची शब्द (1)पर्यायवाची शब्द (2)
अंतरिक्षनभ / गगनअंबर / व्योम
धरापृथ्वी / भूवसुंधरा / धरणी
अमर्त्यदेव / अमरसुर / देवता
पंथमार्ग / राहरास्ता / पथ
वित्तधन / दौलतसंपत्ति / अर्थ

5. 15 उच्च-स्तरीय बोर्ड परीक्षा मॉडल प्रश्न (CBSE HOTS & FAQs)

Question 1. कवि ने ‘पशु-प्रवृत्ति’ किसे कहा है और यह मानवीय चेतना से किस प्रकार भिन्न है? [CBSE 2023]

Answer: कवि के अनुसार ‘आप आप ही चरना’ अर्थात् केवल अपने पेट, अपने स्वार्थ और अपने परिवार के भरण-पोषण की चिंता में लिप्त रहना ही ‘पशु-प्रवृत्ति’ है। पशु केवल अपने आहार और सुरक्षा को देखता है, उसे समाज या दूसरों की पीड़ा से कोई सरोकार नहीं होता। इसके विपरीत, मानवीय चेतना सहानुभूति, त्याग, परोपकार और विश्व-कल्याण पर टिकी है। सच्चा मनुष्य वही है जो दूसरों की भलाई के लिए जीता और मरता है

Question 2. ‘अखंड आत्म-भाव जो असीम विश्व में भरे’—इस पंक्ति का दार्शनिक भाव स्पष्ट कीजिए।

Answer: इसका दार्शनिक भाव यह है कि मनुष्य को संकीर्ण सीमाओं (जाति, देश, भाषा, वर्ण) से ऊपर उठकर संपूर्ण संसार के प्रत्येक जीव में अपने ही आत्म-तत्त्व का दर्शन करना चाहिए। जब मनुष्य दूसरों को अपने से अलग न मानकर ‘अखंड आत्म-भाव’ स्थापित करता है, तो राग-द्वेष और शत्रुता समाप्त हो जाती है और सच्चे विश्व-प्रेम (Universal Love) का उदय होता है

Question 3. महर्षि दधीचि और राजा शिबि (उशीनर) के त्याग की आधुनिक संदर्भ में क्या प्रासंगिकता है?

Answer: महर्षि दधीचि का अस्थि-दान और राजा शिबि का मांस-दान आज के चिकित्सा और सामाजिक संदर्भ में ‘अंग-दान’ (Organ Donation), ‘रक्त-दान’ तथा ‘देह-दान’ का महानतम प्राचीन प्रतीक है। जिस प्रकार उन्होंने दूसरों की जान बचाने के लिए अपने शरीर का उत्सर्ग किया, उसी प्रकार आधुनिक मानव भी अंग-दान करके कई असहाय लोगों को नया जीवन प्रदान कर सकता है।

Question 4. ‘अनंत अंतरिक्ष में अनंत देव हैं खड़े’—पंक्ति के माध्यम से कवि क्या प्रेरणा देते हैं?

Answer: कवि यह प्रेरणा देते हैं कि परोपकारी, त्यागी और निष्कलंक मनुष्यों का स्वागत करने के लिए साक्षात देवतागण अंतरिक्ष में अपनी भुजाएँ फैलाए खड़े हैं। जो व्यक्ति समाज की भलाई के लिए निःस्वार्थ भाव से कार्य करते हैं, उन्हें मरणोपरांत देवताओं की पवित्र गोद (अमर्त्य-अंक) में सर्वोच्च स्थान और अमरत्व प्राप्त होता है

Question 5. मैथिलीशरण गुप्त जी ने ‘सहानुभूति’ को ‘महाविभूति’ की संज्ञा क्यों दी है?

Answer:

‘महाविभूति’ का अर्थ है—सबसे बड़ा ऐश्वर्य या अलौकिक शक्ति। धन-दौलत केवल भौतिक वस्तुएँ खरीद सकती है, परंतु किसी के हृदय को नहीं जीत सकती। सहानुभूति और करुणा वह अद्वितीय शक्ति है जो शत्रु को भी मित्र बना देती है और पाषाण हृदय को भी पिघला देती है। यह मनुष्य को ईश्वर के समकक्ष प्रतिष्ठित करती है, इसलिए इसे ‘महाविभूति’ कहा गया है।

Question 6. ‘अंतरैक्य में प्रमाणभूत वेद हैं’—कवि ने वेदों का प्रमाण क्यों प्रस्तुत किया है?

Answer: कवि यह स्पष्ट करना चाहते हैं कि सभी मनुष्यों के भीतर एक ही परमात्मा का अंश (आत्मा) विद्यमान है। इस आंतरिक एकता (अंतरैक्य) का सबसे बड़ा प्रमाण हमारे सनातन ग्रंथ ‘वेद’ हैं। वेदों में ‘एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति’ और ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ के माध्यम से समस्त चराचर जगत में एक ही चेतना के विस्तार की पुष्टि की गई है

Question 7. ‘वही समर्थ भाव है कि तारता हुआ तरे’—पंक्ति का मूल संदेश क्या है?

Answer:

इस पंक्ति का मूल संदेश सामूहिक उत्थान और सह-अस्तित्व है। केवल स्वयं का स्वार्थ सिद्ध कर लेना या स्वयं प्रगति कर लेना सच्ची सक्षमता नहीं है। वास्तविक सामर्थ्यवान और श्रेष्ठ मनुष्य वह है जो समाज के पिछड़े, असहाय और पीड़ित लोगों को साथ लेकर उनका उद्धार (तारता हुआ) करे और स्वयं भी सफलता की ऊँचाइयों को छुए (तरे)।

Question 8. कविता में वर्णित ‘रंतिदेव’ की कथा से विद्यार्थियों को क्या नैतिक शिक्षा मिलती है?

Answer: राजा रंतिदेव कई दिनों के उपवास के बाद जैसे ही भोजन ग्रहण करने वाले थे, उनके द्वार पर एक भूखा भिक्षुक आ गया। उन्होंने स्वयं भूखे रहकर अपने हाथ की भोजन की थाली (करस्थ थाल) याचक को समर्पित कर दी। इससे यह शिक्षा मिलती है कि त्याग का वास्तविक मूल्य तब होता है जब हम अभाव और संकट के समय भी दूसरों की पीड़ा को प्राथमिकता देते हैं

Question 9. अभिकथन (A) और तर्क (R) आधारित प्रश्न: अभिकथन (A): परोपकारी मनुष्य की मृत्यु को कवि ने ‘सुमृत्यु’ कहा है

तर्क (R): ऐसा मनुष्य मृत्यु के बाद भी अपने यश और सत्कर्मों के माध्यम से सदैव याद रखा जाता है

(क) A और R दोनों सही हैं, और R, A की सही व्याख्या है।

(ख) A और R दोनों सही हैं, परंतु R, A की सही व्याख्या नहीं है।

(ग) A सही है, परंतु R गलत है।

(घ) A गलत है, परंतु R सही है।

Answer:

सही उत्तर: (क) A और R दोनों सही हैं, और R, A की सही व्याख्या है।

स्पष्टीकरण: परोपकारी मनुष्य का जीवन अमर बन जाता है और समाज उसके सत्कर्मों को युगों तक याद रखता है, इसलिए उसकी मृत्यु ‘सुमृत्यु’ मानी जाती है

Question 10. मैथिलीशरण गुप्त की काव्य-भाषा की दो प्रमुख विशेषताएँ ‘मनुष्यता’ के संदर्भ में लिखिए

Answer:

  1. संस्कृतनिष्ठ तत्सम प्रधान खड़ी बोली: कविता में शुद्ध, परिमार्जित और गंभीर तत्सम शब्दों (जैसे—क्षुधार्त, परार्थ, अंतरैक्य, अमर्त्य-अंक) का प्रयोग हुआ है, जो भावों को गरिमा प्रदान करते हैं।
  2. प्रभावी उपदेशात्मक एवं ओजस्वी शैली: भाषा में प्रवाहमयता, तुकबंदी और प्रेरक ओज है, जो पाठक के मन में राष्ट्र-प्रेम, त्याग और मानव-कल्याण की भावना जाग्रत करता है।

Question 11. ‘विपत्ति, विघ्न जो पड़ें उन्हें ढकेलते हुए’—मार्ग में आने वाली बाधाओं के प्रति मनुष्य का क्या दृष्टिकोण होना चाहिए?

Answer: मनुष्य को मार्ग में आने वाली कठिनाइयों, संकटों और चुनौतियों से डरकर पलायन नहीं करना चाहिए, बल्कि धैर्य और अदम्य साहस के साथ उन्हें पराजित (ढकेलते हुए) करना चाहिए। कठिनाइयाँ मनुष्य के संकल्प को दृढ़ बनाती हैं। अतः सकारात्मकता के साथ निरंतर आगे बढ़ते रहना चाहिए

Question 12. ‘मदांध तुच्छ वित्त में’—कवि ने धन को ‘तुच्छ’ क्यों कहा है?

Answer: कवि ने धन को ‘तुच्छ’ इसलिए कहा है क्योंकि धन भौतिक, नश्वर और क्षणभंगुर है। यह मनुष्य के साथ सदा नहीं रहता और मृत्यु के बाद यहीं छूट जाता है। धन से आत्मिक शांति, सच्चा प्रेम और अमरता नहीं खरीदी जा सकती। इसलिए ऐसे नश्वर साधन पर घमंड करना सर्वथा व्यर्थ और मूर्खतापूर्ण है

Question 13. ‘परस्परावलंब’ शब्द का समाज के विकास में क्या महत्त्व है?

Answer: ‘परस्परावलंब’ का अर्थ है—एक-दूसरे का सहारा बनना या परस्पर सहयोग। कोई भी मनुष्य अकेला संपूर्ण नहीं हो सकता। समाज का प्रत्येक अंग दूसरे पर निर्भर है। जब हम एक-दूसरे की क्षमताओं का आदर करते हुए मिलकर कार्य करते हैं, तभी समाज में सुख, शांति, समृद्धि और अखंड विकास संभव होता है

Question 14. केस स्टडी प्रश्न (Case Study Scenario):

एक संपन्न व्यवसायी अपने व्यापार में अत्यधिक लाभ कमाता है, परंतु वह अपने कर्मचारियों के स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा के प्रति पूर्णतः उदासीन रहता है। वह सारा धन अपने व्यक्तिगत ऐशो-आराम और विलासिता पर खर्च करता है।

‘मनुष्यता’ कविता के आधार पर उक्त व्यवसायी की जीवन-शैली का समालोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए।

Answer: ‘मनुष्यता’ कविता के सिद्धांतों के अनुसार उक्त व्यवसायी की जीवन-शैली ‘पशु-प्रवृत्ति’ (‘आप आप ही चरना’) का परिचायक है। कवि मैथिलीशरण गुप्त के अनुसार ऐसा जीवन व्यर्थ है क्योंकि:

  1. वह ‘मदांध तुच्छ वित्त’ में लीन होकर अपने साथी मनुष्यों की पीड़ा की उपेक्षा कर रहा है।
  2. सच्चा मनुष्य और समर्थ व्यक्ति वही है जो दूसरों की भलाई करता है और सबको साथ लेकर आगे बढ़ता है। केवल व्यक्तिगत विलासिता में जीने वाले को समाज मृत्यु के बाद भुला देता है। अतः उसे अपने धन का उपयोग परोपकार और जनकल्याण में करना चाहिए।

Question 15. ‘मनुष्यता’ कविता की प्रासंगिकता आज के युद्ध-ग्रस्त और विभाजित विश्व में किस प्रकार सिद्ध होती है?

Answer: आज का विश्व सीमाओं के विवाद, संप्रदायवाद, आतंकवाद, युद्ध और संकीर्ण राष्ट्रवाद की आग में झुलस रहा है। ऐसे समय में गुप्त जी का ‘मनुष्य मात्र बंधु है’ और ‘अखंड आत्म-भाव’ का संदेश अत्यंत प्रासंगिक है। यदि संसार के देश और नागरिक एक-दूसरे को अपना बंधु मान लें और करुणा की ‘महाविभूति’ को अपनाएँ, तो सभी प्रकार के युद्ध, हिंसा और वैमनस्य का स्थायी समाधान हो सकता है

6. CONCLUDING BOARD TOPPER STRATEGY

सीबीएसई कक्षा 10 हिंदी बोर्ड परीक्षा में ‘मनुष्यता’ अध्याय से पूरे अंक (Full Marks) सुनिश्चित करने के लिए विशेष युक्तियाँ:

  1. पौराणिक पात्रों के सटीक नाम और संदर्भ: दधीचि (अस्थि-दान), रंतिदेव (करस्थ थाल दान), उशीनर/शिबि (मांस-दान), तथा कर्ण (कवच-कुंडल दान) के संदर्भों को उत्तर में स्पष्ट रूप से लिखें और उन्हें रेखांकित (Underline) करें।
  2. पशु-प्रवृत्ति बनाम सच्ची मनुष्यता का अंतर: जब भी मनुष्यता की परिभाषा का प्रश्न आए, तो ‘आप आप ही चरना’ (पशु-प्रवृत्ति) और ‘दूसरों के लिए मरना’ (मनुष्यता) का तुलनात्मक विश्लेषण अवश्य दें।
  3. काव्य-सौंदर्य में मानक बिंदुओं का समावेश: भाव-सौंदर्य के साथ शिल्प-सौंदर्य में तत्सम प्रधान खड़ी बोली, ओज गुण, उपदेशात्मक शैली, तथा अनुप्रास एवं रूपक अलंकारों का उल्लेख करें।
  4. अति-संक्षिप्तता या अनावश्यक विस्तार से बचाव: प्रश्न में जितने अंक और जितनी बात पूछी गई हो, टू-द-पॉइंट (टू-द-मार्क) उत्तर प्रस्तुत करें ताकि परीक्षक को एक दृष्टि में मुख्य उत्तर मिल सके।

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