NCERT Solutions Class 10 Hindi स्पर्श कविता 1: साखी

NCERT Solutions for Class 10 Hindi स्पर्श (भाग-2) कविता 1: कबीर की साखी

1. SEO STRATEGY INTRODUCTION & CHAPTER MASTER OVERVIEW

कक्षा 10 हिंदी पाठ्यक्रम ‘ब’ (Course B) की पाठ्यपुस्तक ‘स्पर्श भाग-2’ का प्रथम काव्य अध्याय कबीर की ‘साखी’ अत्यंत महत्त्वपूर्ण और केंद्रीय स्थान रखता है। सीबीएसई (CBSE) बोर्ड परीक्षाओं में इस अध्याय से काव्य-बोध, आशय स्पष्टीकरण, लघु व दीर्घ उत्तरीय विश्लेषणात्मक प्रश्न, तथा मूल्यपरक बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs) अनिवार्य रूप से पूछे जाते हैं। बोर्ड परीक्षा में विद्यार्थियों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे कबीर के दार्शनिक भावों को व्यावहारिक जीवन और आधुनिक सामाजिक संदर्भों से जोड़ते हुए मानक साहित्यिक हिंदी में उत्तर प्रस्तुत करें।

‘साखी’ शब्द वस्तुतः संस्कृत के ‘साक्षी’ शब्द का तद्भव रूप है, जिसका शाब्दिक अर्थ होता है—प्रत्यक्षदर्शी ज्ञान या आँखों देखा सत्य। कबीरदास जी निर्गुण ज्ञानाश्रयी काव्यधारा के प्रतिनिधि संत कवि थे। उन्होंने किताबी ज्ञान की अपेक्षा स्वानुभूति एवं प्रत्यक्ष लोक-अनुभव को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। कबीर की साखियों में प्रयुक्त छंद ‘दोहा’ है, जो 13 और 11 मात्राओं के विश्राम (यति) से बनता है। भाषा की दृष्टि से कबीर की रचनाओं में सधुक्कड़ी और पंचमेल खिचड़ी शैली मिलती है, जिसमें अवधी, ब्रज, भोजपुरी, राजस्थानी, पंजाबी और फारसी के देशज शब्दों का जीवंत मिश्रण है।

अधिकांश विद्यार्थी बोर्ड परीक्षा में यह सामान्य त्रुटि करते हैं कि वे कबीर के दोहों का केवल शाब्दिक व सतही अर्थ लिखकर छोड़ देते हैं। परीक्षक हमेशा उत्तर में आंतरिक दार्शनिक भाव, आध्यात्मिक प्रतीकात्मकता, और व्यावहारिक जीवन-मूल्य की खोज करते हैं। उदाहरण के लिए, ‘कस्तूरी’ केवल एक सुगंधित पदार्थ नहीं बल्कि परमात्मा की अंतर्व्यापकता का प्रतीक है; ‘दीपक’ केवल लौ नहीं, बल्कि ज्ञान और आत्म-साक्षात्कार का प्रतीक है। उत्तर लिखते समय इन गहरे प्रतीकों और पारिभाषिक शब्दों को रेखांकित करना शत-प्रतिशत अंक सुनिश्चित करता है।

मास्टर सारांश सारणी: कबीर की साखियों का केंद्रीय भाव व प्रमुख प्रतीक

साखी क्रमप्रमुख विषय / केंद्रीय भावप्रयुक्त मुख्य प्रतीकव्यावहारिक व आध्यात्मिक संदेश
साखी 1मीठी वाणी का प्रभावमन का आपा (अहंकार)अहंकार त्यागकर मृदु वचन बोलने से स्वयं को शीतलता और दूसरों को सुख मिलता है।
साखी 2ईश्वर की अंतर्व्यापकताकस्तूरी एवं मृगपरमात्मा बाह्य आडंबरों में नहीं, बल्कि घट-घट (प्रत्येक जीव के हृदय) में वास करते हैं।
साखी 3अहंकार और ज्ञान का संबंधअंधियारा एवं ज्ञान का दीपकजहाँ ‘मैं’ (अहंकार) होता है वहाँ ईश्वर नहीं होते; ज्ञानरूपी दीपक से अज्ञान नष्ट होता है।
साखी 4अज्ञानी संसार बनाम जाग्रत भक्तसंसार का सोना-खाना, भक्त का रोनासांसारिक भोग-विलास नश्वर हैं; ईश्वर-विरह में जाग्रत रहने वाला भक्त ही सच्चा जीवन पाता है।
साखी 5विरह की मार्मिक व्यथाबिरह भुवंगम (वियोग रूपी सर्प)ईश्वर-वियोग में भक्त सांसारिक रूप से जी नहीं सकता; जीता है तो लोक-दृष्टि में बौरा जाता है।
साखी 6निंदक का महत्त्वनिंदक नेड़ा राखियेआलोचक बिना साबुन और पानी के स्वभाव के विकारों को दूर कर अंतःकरण को निर्मल करता है।
साखी 7पुस्तकीय ज्ञान बनाम सच्चा प्रेमपोथी, ढाई आखर प्रेम काकेवल शास्त्र रटने से कोई ज्ञानी नहीं बनता; ईश्वर व मानवता से प्रेम करने वाला ही सच्चा पंडित है।
साखी 8मोह-माया का त्यागअपना घर जलाना (अहंकार नष्ट करना)जो व्यक्ति वासना और स्वार्थरूपी घर को जलाकर ज्ञान की मशाल उठाता है, वही समाज-कल्याण कर सकता है।

2. NCERT पाठ्यपुस्तक अभ्यास: प्रश्न एवं आदर्श उत्तर

Question 1. मीठी वाणी बोलने से औरों को सुख और अपने तन को शीतलता कैसे प्राप्त होती है? (Page No. 5) [CBSE 2023, 2020]

Answer: मीठी वाणी का मानव जीवन में असाधारण नैतिक और सामाजिक महत्त्व है। जब कोई व्यक्ति अपने मन का ‘आपा’ अर्थात् अहंकार, दर्प और क्रोध को पूर्णतः त्यागकर मधुर एवं विनम्र वाणी बोलता है, तो उसके शब्दों में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। कटु वचन जहाँ सुनने वाले के हृदय को छलनी कर देते हैं और प्रतिशोध की ज्वाला भड़काते हैं, वहीं मीठे बोल पारस्परिक सौहार्द, अपनत्व, और शांति का वातावरण निर्मित करते हैं।

जब हम दूसरों से प्रेमपूर्वक बात करते हैं, तो श्रोता के मन से तनाव, आक्रोश और निराशा समाप्त हो जाती है और उसे असीम आत्मिक सुख एवं मानसिक तृप्ति मिलती है। इसके साथ ही, जब हमारे भीतर से क्रोध और घमंड का निष्कासन हो जाता है, तो हमारा रक्तचाप और चित्त शांत रहता है। मन की यह एकाग्रता और पवित्रता हमारे अपने अंतःकरण और शरीर को परम शीतलता और शांति प्रदान करती है। अतः मीठी वाणी दोनों पक्षों के लिए कल्याणकारी है।

Question 2. दीपक दिखाई देने पर अँधियारा कैसे मिट जाता है? साखी के संदर्भ में स्पष्ट कीजिए। (Page No. 5) [BOARD EXAM FAVORITE]

Answer: भौतिक दृष्टि से दीपक के प्रज्वलित होते ही कमरों और गलियों का सघन अंधकार स्वतः नष्ट हो जाता है और प्रत्येक वस्तु अपने वास्तविक रूप में दृष्टिगोचर होने लगती है। साखी के संदर्भ में कबीरदास जी ने ‘दीपक’ और ‘अँधियारे’ का प्रयोग गहरे आध्यात्मिक एवं दार्शनिक प्रतीकों के रूप में किया है। यहाँ ‘दीपक’ ईश्वर-ज्ञान, आत्म-साक्षात्कार और विवेक का प्रतीक है, जबकि ‘अँधियारा’ अज्ञानता, भ्रम, संशय, मोह-माया और अहंकार का प्रतीक है।

कबीर कहते हैं कि जब सद्गुरु की कृपा से साधक के हृदय में ब्रह्म-ज्ञान का ज्योतिपुंज प्रज्वलित होता है, तो सदियों से जमा अज्ञान और मिथ्या अहंकार का अंधकार क्षणभर में समाप्त हो जाता है। साधक को यह स्पष्ट बोध हो जाता है कि आत्मा और परमात्मा में कोई तात्विक भेद नहीं है। इस प्रकार, ज्ञान के प्रकाश में जीव सांसारिक बंधनों से मुक्त होकर सत्य का साक्षात्कार कर लेता है।

Question 3. ईश्वर कण-कण में व्याप्त है, पर हम उसे क्यों नहीं देख पाते? (Page No. 5) [CBSE 2022]

Answer: ईश्वर सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान और घट-घट वासी हैं। वे सृष्टि के प्रत्येक चेतन और अचेतन तत्त्व में विद्यमान हैं। इसके बावजूद एक साधारण मनुष्य उन्हें देख पाने में सर्वथा असमर्थ रहता है। इसका प्रमुख कारण मनुष्य के भीतर विद्यमान अज्ञानता का आवरण, सांसारिक विषयों के प्रति आसक्ति और सूक्ष्म अहंकार है। मनुष्य अपनी स्थूल इंद्रियों और संकीर्ण दृष्टि से परमात्मा को मंदिर, मस्जिद, तीर्थों और बाह्य कर्मकांडों में खोजता फिरता है।

कबीरदास जी ने मृग और कस्तूरी के सटीक दृष्टांत द्वारा इस स्थिति को स्पष्ट किया है। जिस प्रकार कस्तूरी मृग की अपनी नाभि में ही सुगंधित कस्तूरी विद्यमान होती है, परंतु वह उसकी खुशबू से भ्रमित होकर उसे पूरे जंगल की झाड़ियों में खोजता मर जाता है; ठीक उसी प्रकार मनुष्य भी अपने हृदय में विराजमान ईश्वर को न पहचानकर बाह्य संसार में भटकता रहता है। जब तक मनुष्य का अंतःकरण शुद्ध और अहं-मुक्त नहीं होता, तब तक सर्वव्यापी ईश्वर का दर्शन असंभव है।

Question 4. संसार में सुखी व्यक्ति किसे कहा गया है और दुखी किसे? यहाँ ‘सोना’ और ‘जागना’ किसके प्रतीक हैं? इसका प्रयोग यहाँ क्यों किया गया है? स्पष्ट कीजिए। (Page No. 5) [CBSE 2019, 2024]

Answer: कबीरदास जी के अनुसार, संसार में ‘सुखी’ व्यक्ति वह साधारण संसारी जन है, जो भौतिक सुख-सुविधाओं, भोग-विलास, खाने-पीने और निद्रा को ही जीवन का अंतिम ध्येय मान बैठा है। ऐसा व्यक्ति मृत्यु, जीवन के वास्तविक उद्देश्य और आध्यात्मिक सत्य से पूर्णतः बेखबर रहता है। इसके विपरीत, ‘दुखी’ व्यक्ति वह संवेदनशील संत या साधक है, जो इस संसार की क्षणिकता, नश्वरता और जीवों के मोहग्रस्त पतन को देखकर व्याकुल रहता है और प्रभु के वियोग में निरंतर जागकर रोता रहता है।

यहाँ ‘सोना’ अज्ञानता, आध्यात्मिक निष्क्रियता, सांसारिक विषयों में लिप्तता और मोह-माया के गहन अंधकार का प्रतीक है। दूसरी ओर, ‘जागना’ आत्मिक चेतना, ईश्वरीय जागरण, विवेक और ज्ञान के प्रकाश का प्रतीक है।

कबीरदास जी ने इन दोनों प्रतीकों का प्रयोग तत्कालीन समाज के अंतर्विरोधों को उजागर करने के लिए किया है। कबीर समाज को यह कठोर चेतावनी देना चाहते हैं कि जो लोग सांसारिक सुखों को वास्तविक मानकर बेपरवाह सो रहे हैं, वे वस्तुतः आत्म-विनाश के मार्ग पर हैं; जबकि जो ईश्वरीय विरह और सत्य की खोज में जाग्रत हैं, वही सच्चे अर्थों में जीवन के परम लक्ष्य (मोक्ष) को प्राप्त करते हैं।

Question 5. अपने स्वभाव को निर्मल रखने के लिए कबीर ने क्या उपाय सुझाया है? (Page No. 5) [CBSE 2020]

Answer: अपने स्वभाव, चित्त और आचरण को पूर्णतः विकार-मुक्त और निर्मल बनाए रखने के लिए कबीरदास जी ने एक अत्यंत व्यावहारिक और मनोवैज्ञानिक उपाय सुझाया है। कबीर कहते हैं कि मनुष्य को अपनी निंदा और आलोचना करने वाले व्यक्ति (निंदक) को सदा अपने अत्यंत निकट (हो सके तो अपने आँगन में कुटी बनवाकर) रखना चाहिए।

सामान्यतः मनुष्य अपनी आलोचना से भागता है और चाटुकारों की प्रशंसा में खोकर अपने दोषों को अनदेखा कर देता है। परंतु निंदक हमारी प्रत्येक छोटी-बड़ी त्रुटि, स्वभावगत दुर्बलता और गलतियों को स्पष्ट रूप से उजागर करता रहता है। जब हमें अपनी कमियों का निरंतर बोध होता रहता है, तो हम सतर्क होकर उन्हें सुधारने का प्रयास करते हैं। इस प्रकार, आलोचक रूपी साधन बिना साबुन और पानी के (स्वाभाविक आत्म-निरीक्षण द्वारा) हमारे अंतःकरण के समस्त मैल को धोकर हमारे स्वभाव को पूर्णतः स्वच्छ और पवित्र बना देता है।

Question 6. ‘ऐका असिर पीव का, पढ़ै सु पंडित होइ’—इस पंक्ति द्वारा कवि क्या कहना चाहता है? (Page No. 5)

Answer: इस कालजयी पंक्ति के माध्यम से कबीरदास जी ने पोथी-पांडित्य, किताबी ज्ञान और बाह्य विद्वता के दंभ पर करारी चोट की है। कबीर का स्पष्ट मंतव्य है कि केवल मोटे-मोटे धार्मिक ग्रंथों, शास्त्रों, वेदों और उपनिषदों को कंठस्थ कर लेने से कोई भी मनुष्य सच्चा ज्ञानी या ‘पंडित’ नहीं बन सकता। शुष्क बौद्धिक ज्ञान मनुष्य के भीतर केवल पांडित्य का घमंड भरता है।

सच्चा ज्ञानी वह है जिसने ‘पीव’ अर्थात् परमात्मा और मानवता के प्रेम का केवल एक अक्षर (ढाई आखर) अपने जीवन में धारण कर लिया हो। ईश्वर का साक्षात्कार केवल शुष्क तर्कों से नहीं, बल्कि हृदय की असीम करुणा, संवेदनशीलता, समर्पण और सार्वभौमिक प्रेम से ही संभव है। जिसने सृष्टि के समस्त जीवों से प्रेम करना सीख लिया और परमात्मा से एकाकार हो गया, वही समाज का वास्तविक मार्गदर्शक और सच्चा पंडित है।

Question 7. कबीर की उद्धृत साखियों की भाषा की विशेषता स्पष्ट कीजिए। (Page No. 5) [CBSE 2023]

Answer: कबीरदास जी की काव्य-भाषा हिंदी साहित्य में अद्वितीय और अत्यंत प्रभावशाली मानी जाती है। उनकी भाषा की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

  • सधुक्कड़ी एवं पंचमेल खिचड़ी शैली: कबीर एक घुमक्कड़ संत थे। देशाटन और संतों की संगति के कारण उनकी भाषा में अवधी, ब्रज, भोजपुरी, राजस्थानी, पंजाबी, खड़ी बोली तथा अरबी-फारसी के देशज शब्दों का सहज समावेश है।
  • लोक-संवेदना और सहज संप्रेषणीयता: कबीर ने जनमानस के सीधे संवाद की भाषा अपनाई। उनकी भाषा में बनावटीपन, क्लिष्ट संस्कृत शब्दावली या कृत्रिम आलंकारिकता नहीं है।
  • प्रतीकात्मकता और उपमेय-उपमान विधान: कबीर ने गूढ़ दार्शनिक सत्यों को समझाने के लिए अत्यंत सहज और दैनिक जीवन के प्रतीकों (जैसे कस्तूरी, मृग, दीपक, निंदक, भुवंगम, मशाल) का प्रयोग किया है।
  • दोहा छंद और गेयता: साखियों में 13-11 मात्राओं वाला पारंपरिक दोहा छंद प्रयुक्त हुआ है, जिसमें आंतरिक लय, नाद-सौंदर्य और तुकबंदी (तुकांतता) के कारण अद्भुत गेयता विद्यमान है।
  • अलंकार योजना: साखियों में अनुप्रास, रूपक, दृष्टांत, पुनरुक्ति प्रकाश और अन्योक्ति अलंकारों का स्वाभाविक और सटीक प्रयोग हुआ है, जो भावों को तीव्रता प्रदान करते हैं।

3. भाव एवं आशय स्पष्टीकरण (दीर्घ उत्तरीय प्रश्न)

Question 8. निम्नलिखित का भाव स्पष्ट कीजिए: (क) बिरह भुवंगम तन बसै, मंत्र न लागै कोइ। (Page No. 5) [CBSE 2023]

Answer:प्रसंग: प्रस्तुत पंक्ति हमारी पाठ्यपुस्तक ‘स्पर्श भाग-2’ के काव्य-खंड ‘साखी’ से उद्धृत है। इसके रचयिता संत कबीरदास जी हैं।

भावार्थ: इस पंक्ति में कबीरदास जी ने ईश्वर-विरह की असह्य और प्राणघातक वेदना का अत्यंत मार्मिक एवं प्रतीकात्मक चित्रण किया है। कबीर कहते हैं कि जब किसी भक्त के शरीर और अंतःकरण में परमात्मा के वियोग रूपी विषैला सर्प (‘बिरह भुवंगम’) अपना स्थायी डेरा जमा लेता है, तो उस पर संसार का कोई भी तंत्र-मंत्र, झाड़-फूँक, औषधि या सांसारिक उपचार काम नहीं करता।

ईश्वर के प्रेम में व्याकुल साधक की दशा अत्यंत दयनीय हो जाती है। वह परमात्मा के मिलन के बिना जीवित नहीं रह सकता। यदि वह किसी प्रकार संसार की दृष्टि में जीवित भी रहता है, तो ईश्वर-प्रेम की दीवानगी में वह अपनी सुध-बुध खो बैठता है और समाज उसे ‘बौरा’ (पागल) समझने लगता है। यहाँ कबीर ने भक्त की अनन्य निष्ठा और विरह की पराकाष्ठा को अभिव्यक्ति दी है।

(ख) कस्तूरी कुंडलि बसै, मृग ढूँढै बन माँहि। (Page No. 5)

Answer:प्रसंग: प्रस्तुत साखी संत कबीरदास जी द्वारा रचित है, जिसमें ईश्वर की सर्वव्यापकता को रेखांकित किया गया है।

भावार्थ: कबीरदास जी एक अत्यंत स्वाभाविक दृष्टांत के माध्यम से मनुष्य के भ्रम को उजागर करते हैं। वे कहते हैं कि मृग (हिरण) की अपनी नाभि (कुंडलि) के भीतर ही अत्यंत सुगंधित कस्तूरी विद्यमान होती है, परंतु हिरण इस रहस्य से सर्वथा अनभिज्ञ रहता है। जब कस्तूरी की मनमोहक सुगंध वातावरण में फैलती है, तो वह पागल होकर उस गंध के स्रोत को पूरे घने जंगल में खोजता फिरता है।

ठीक यही विडंबना अज्ञानी मनुष्य के साथ है। परमात्मा संसार के प्रत्येक प्राणी के हृदय रूपी घट में विद्यमान हैं, परंतु मनुष्य अपने आंतरिक अज्ञान और बाह्य आडंबरों के कारण उन्हें मंदिर, मस्जिद, काबा, और कैलाश जैसे तीर्थस्थलों में ढूँढता भटक रहा है। कबीर आत्म-निरीक्षण और अंतर्मुखी साधना पर बल देते हैं।

(ग) जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाँहि। (Page No. 5) [CBSE 2018, 2022]

Answer:प्रसंग: प्रस्तुत साखी संत कबीरदास जी द्वारा विरचित है। इसमें अहंकार और ईश्वर-प्राप्ति के परस्पर विरोधी स्वभाव का दार्शनिक विश्लेषण किया गया है।

भावार्थ: यहाँ ‘मैं’ शब्द व्यक्तिगत अहंकार, दर्प, घमंड और अज्ञानता का सूचक है, जबकि ‘हरि’ परमब्रह्म, अनंत चेतना और दिव्य ज्ञान के प्रतीक हैं। कबीरदास जी कहते हैं कि जब तक मेरे हृदय में ‘मैं’ अर्थात् मेरा अहंकार जीवित था, तब तक वहाँ ईश्वर का कोई वास नहीं था, क्योंकि अहंकार और परमात्मा एक साथ एक ही अंतःकरण में कभी निवास नहीं कर सकते।

परंतु जब सद्गुरु के ज्ञान के प्रकाश से मेरे भीतर का सारा अहंकार और संकीर्णता भस्म हो गई, तब मेरे पूरे अंतःकरण में केवल परमात्मा की ज्योति व्याप्त हो गई। अहंकार के मिटते ही द्वैत समाप्त हो गया और आत्मा का परमात्मा के साथ पूर्ण अद्वैत मिलन घटित हो गया। परमात्मा की प्राप्ति के लिए निरहंकारी होना अनिवार्य शर्त है।

(घ) पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुवा, पंडित भया न कोइ। (Page No. 5)

Answer:प्रसंग: प्रस्तुत पंक्ति संत कबीरदास द्वारा रचित साखियों से ली गई है, जिसमें शुष्क पुस्तकीय ज्ञान की निरर्थकता प्रतिपादित की गई है।

भावार्थ: कबीरदास जी तत्कालीन समाज में प्रचलित धार्मिक रूढ़िवादिता और किताबी पांडित्य पर तीव्र प्रहार करते हुए कहते हैं कि यह संसार युगों-युगों से वेद, शास्त्र, स्मृति और विशाल पोथियों को रट-रटकर मृत्यु के मुख में समाता रहा, परंतु उन शुष्क ग्रंथों को पढ़ने मात्र से कोई भी व्यक्ति वास्तविक अर्थों में ज्ञानी या ‘पंडित’ नहीं बन सका।

पुस्तकीय ज्ञान केवल मस्तिष्क को तर्कों से भरता है, हृदय को संवेदनशील नहीं बनाता। आध्यात्मिक सत्य और मोक्ष की प्राप्ति केवल शब्दों के जाल से नहीं, बल्कि ईश्वर-प्रेम, करुणा और आत्मानुभूति से होती है। जिसने प्रेम और करुणा के मूल तत्त्व को समझ लिया, वही ब्रह्मांड के गूढ़तम सत्य को जान पाता है।

4. भाषा अध्ययन एवं व्यावहारिक व्याकरण

Question 9. पाठ में आए निम्नलिखित देशज / तद्भव शब्दों के मानक हिंदी (खड़ी बोली) रूप लिखिए:

मूल पाठगत शब्द (तद्भव/सधुक्कड़ी)मानक हिंदी रूप (तत्सम/खड़ी बोली)
औरणऔरों को / दूसरों को
माहिंमें / के भीतर / अंदर
दीपकदिया / दीप / प्रकाश का स्रोत
मूँवामरा / मृत / नष्ट हुआ
नेड़ानिकट / पास / समीप
आंगणिआँगन में
साबणसाबुन
मुवामरा / नष्ट हुआ
पीवप्रियतम / प्रिय / परमात्मा
जालौंजलाऊँ / भस्म करूँ
तासिकाउसका / उसके
भयाहुआ / बन गया
भुवंगमभुजंग / सर्प / साँप
बौराइपागल हो जाना / बावला होना

5. 15 उच्च-स्तरीय बोर्ड परीक्षा मॉडल प्रश्न (CBSE HOTS & Case Study FAQs)

Question 1. कबीर की साखियों में ‘आपा’ शब्द किस दुर्गुण की ओर संकेत करता है और इसका त्याग करना क्यों आवश्यक है?

Answer: ‘आपा’ शब्द का अर्थ है मिथ्या अहंकार, घमंड, पद-प्रतिष्ठा का दंभ और शारीरिक संकीर्णता। जब तक मनुष्य के भीतर ‘आपा’ रहता है, वह स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ समझता है, जिससे समाज में ईर्ष्या, कटुता और कलह उत्पन्न होता है। अहंकार के रहते ईश्वर का साक्षात्कार असंभव है क्योंकि परमात्मा का वास केवल शुद्ध और विनम्र हृदय में होता है। अतः आत्मिक शांति, सामाजिक सौहार्द और ईश्वरीय कृपा प्राप्त करने के लिए ‘आपा’ का त्याग अनिवार्य है।

Question 2. कबीर ने निंदक की तुलना साबुन और पानी से क्यों की है? स्पष्ट कीजिए।

Answer: साबुन और पानी जिस प्रकार वस्त्रों पर लगी बाह्य धूल, मैल और दाग-धब्बों को धोकर उन्हें स्वच्छ व चमकदार बना देते हैं, ठीक उसी प्रकार निंदक हमारी चारित्रिक बुराइयों, अज्ञानता, अहंकार और नैतिक दुर्बलताओं की निरंतर ओर संकेत करके हमारे अंतःकरण को मांजता रहता है। निंदक की कटु टिप्पणियों से हमें अपनी कमियों का बोध होता है और हम बिना किसी व्यय व प्रयास के आत्म-सुधार कर लेते हैं। इसलिए निंदक को सर्वश्रेष्ठ शोधक माना गया है।

Question 3. ‘घर जाल्या आपणाँ, लिया मुराड़ा हाथि’—इस साखी में घर जलाने और हाथ में जलती लकड़ी (मुराड़ा) लेने का क्या लाक्षणिक अर्थ है? [CBSE 2024 HOTS]

Answer: यहाँ ‘घर जलाना’ कोई भौतिक आगजनी नहीं है, बल्कि इसका लाक्षणिक अर्थ है सांसारिक मोह-माया, विषय-वासनाओं, लोभ, संकीर्ण स्वार्थ और अहंकार का समूल विनाश करना। ‘हाथ में मुराड़ा (ज्ञान की जलती हुई मशाल) लेना’ सत्य, ज्ञान, वैराग्य और आत्म-समर्पण के मार्ग पर निर्भयतापूर्वक आगे बढ़ना है। कबीर कहते हैं कि मैंने अपने भीतर के विकारों को ज्ञान की अग्नि में भस्म कर दिया है और अब जो साधक या शिष्य मेरे साथ प्रभु-भक्ति और समाज-सुधार के मार्ग पर चलना चाहता है, उसे भी अपने मोह-रूपी घर को जलाना होगा।

Question 4. कबीर समाज-सुधारक पहले थे और कवि बाद में—’साखी’ पाठ के आधार पर इस कथन की समीक्षा कीजिए।

Answer: कबीर का मुख्य उद्देश्य किसी काव्य-शास्त्र के नियमों का पालन करना या आलंकारिक चमत्कार दिखाना नहीं था, बल्कि तत्कालीन समाज में व्याप्त रूढ़ियों, जाति-पाँति, धार्मिक पाखंडों, बाह्य आडंबरों और अंधविश्वासों को जड़ से मिटाना था। उन्होंने अपनी साखियों के माध्यम से तत्कालीन हिंदू-मुस्लिम दोनों संप्रदायों के धर्मांध प्रपंचों और पुस्तकीय पांडित्य पर सीधा प्रहार किया। उनकी कविता सामाजिक क्रांति और आध्यात्मिक जागरण का अस्त्र थी। अतः वे निःसंदेह एक निर्भीक समाज-सुधारक पहले थे।

Question 5. ‘सुखिया सब संसार है, खाइ अरु सोवै’—कबीरदास जी ने सांसारिक सुख को मिथ्या और व्यर्थ क्यों ठहराया है?

Answer: कबीरदास जी के अनुसार भौतिक सुख-साधन, स्वादिष्ट भोजन और निश्चिंत निद्रा केवल क्षणिक और नश्वर हैं। सांसारिक मनुष्य यह भूल जाता है कि काल (मृत्यु) निरंतर उसके सिर पर मंडरा रहा है और धन-दौलत यहीं छूट जानी है। भौतिक सुखों में लीन होकर मानव अपने जीवन के सर्वोच्च लक्ष्य ‘ईश्वर-भक्ति और आत्म-कल्याण’ से विमुख हो जाता है। यह सुख वस्तुतः अज्ञानता का भ्रम है, जो अंततः केवल पश्चाताप और भव-बंधन की ओर ले जाता है।

Question 6. कबीर की साखियों में ‘विरह’ की अवस्था को सर्प के विष से भी अधिक कष्टकारी क्यों बताया गया है?

Answer: साधारण सर्प के डसने पर वैद्य विभिन्न औषधियों, जड़ी-बूटियों या मंत्रों से विष का निवारण कर प्राणों की रक्षा कर सकते हैं। परंतु जब परमात्मा के वियोग रूपी सर्प (‘बिरह भुवंगम’) जीवात्मा को डसता है, तो ब्रह्मांड की कोई भी भौतिक औषधि या सांसारिक उपचार काम नहीं करता। इस विरह में साधक न तो सामान्य लोगों की तरह जी पाता है और न ही उसकी मृत्यु होती है; वह केवल अपने प्रियतम (ईश्वर) के दर्शन की तड़प में तिल-तिल कर जलता रहता है।

Question 7. कबीर ने कस्तूरी मृग के माध्यम से तत्कालीन धार्मिक कर्मकांडों पर किस प्रकार व्यंग्य किया है?

Answer: कस्तूरी मृग अपनी ही नाभि में छिपी कस्तूरी की सुगंध से अनजान होकर बाहर वनों में भटकता है। इसी प्रकार तत्कालीन समाज के लोग अपने हृदय में विराजमान घट-घट व्यापी ब्रह्म को न पहचानकर तीर्थ-यात्राओं, मक्का-काशी के फेरों, मूर्तियों की पूजा, तिलक-छापे और व्रत-उपवासों जैसे बाह्य आडंबरों में ईश्वर को खोज रहे थे। कबीर ने इस दृष्टांत से स्पष्ट किया कि अंतर्मुखी भक्ति के बिना बाह्य कर्मकांड पूरी तरह हास्यास्पद और निरर्थक हैं।

Question 8. कबीर की साखियों में ‘प्रेम’ की क्या परिभाषा दी गई है? यह किताबी ज्ञान से किस प्रकार श्रेष्ठ है?

Answer: कबीर के अनुसार ‘प्रेम’ केवल एक भावना नहीं, बल्कि परमात्मा और समस्त प्राणियों के प्रति निस्वार्थ, एकात्म और समर्पित अनुराग है। किताबी ज्ञान केवल मस्तिष्क का बौद्धिक विलास है जो प्रायः मनुष्य को अहंकारी बना देता है। इसके विपरीत प्रेम हृदय को कोमल, दयालु और विशाल बनाता है। जिसने परमात्मा के प्रेम का एक भी अक्षर आत्मसात कर लिया, उसने जीवन के परम रहस्य को जान लिया। इसलिए प्रेम को पोथी-पांडित्य से अनंत गुना श्रेष्ठ माना गया है।

Question 9. अभिकथन (A) और तर्क (R) आधारित प्रश्न:अभिकथन (A): कबीर के अनुसार निंदक को अपने पास रखने से मनुष्य का स्वभाव निर्मल हो जाता है। तर्क (R): निंदक व्यक्ति प्रशंसा करके हमारा मनोबल बढ़ाता है जिससे सकारात्मकता आती है। (क) A और R दोनों सही हैं, और R, A की सही व्याख्या है। (ख) A और R दोनों सही हैं, परंतु R, A की सही व्याख्या नहीं है। (ग) A सही है, परंतु R गलत है। (घ) A गलत है, परंतु R सही है।

Answer:सही उत्तर: (ग) A सही है, परंतु R गलत है।स्पष्टीकरण: अभिकथन (A) पूर्णतः सत्य है क्योंकि कबीर के अनुसार निंदक हमारी त्रुटियों को प्रकट करता है जिससे हम आत्म-सुधार कर स्वभाव को निर्मल बनाते हैं। परंतु तर्क (R) सर्वथा असत्य है क्योंकि निंदक प्रशंसा नहीं करता, बल्कि दोषों को उजागर करता है।

Question 10. साखी के आधार पर बताइए कि ‘ज्ञान का दीपक’ प्रज्वलित होने पर जीवात्मा के भीतर क्या गुणात्मक परिवर्तन आते हैं?

Answer: ज्ञान का दीपक जलने पर जीवात्मा के भीतर से ‘अहं-भाव’ (अहंकार), काम, क्रोध, लोभ, मोह और संशय का अंधकार सदा के लिए मिट जाता है। मनुष्य को समस्त चराचर जगत में एक ही ब्रह्म की सत्ता दिखाई देने लगती है। उसके मन का संकीर्ण भेद-भाव समाप्त हो जाता है, जिससे वह सुख-दुख, लाभ-हानि और मान-अपमान में समभाव (स्थिरप्रज्ञ) होकर परम शांति और मोक्ष की अनुभूति करता है।

Question 11. कबीर की साखियों में प्रयुक्त ‘सधुक्कड़ी’ भाषा की प्रासंगिकता और शक्ति क्या है?

Answer: ‘सधुक्कड़ी’ भाषा आम जनसमुदाय की सीधी, अनगढ़ किंतु अत्यंत सजीव बोली थी। कबीर ने संस्कृत के शास्त्रीय बंधनों को तोड़कर जनसाधारण की भाषा में उपदेश दिए, जिससे उनके गूढ़ दार्शनिक विचार समाज के सबसे निचले और अनपढ़ व्यक्ति तक भी सहजता से पहुँच सके। विभिन्न बोलियों के शब्दों के मेल ने इस भाषा को व्यापक ग्राह्यता, ताजगी और असाधारण संप्रेषण क्षमता प्रदान की।

Question 12. कबीर के अनुसार संसार ‘अंधा’ क्यों है? क्या आधुनिक संदर्भ में भी यह सत्य प्रतीत होता है?

Answer: कबीर संसार को ‘अंधा’ इसलिए कहते हैं क्योंकि यह प्रत्यक्ष सत्य को न देखकर मायावी भ्रम, धन-दौलत और झूठी प्रतिष्ठा के पीछे अंधाधुंध भाग रहा है। आधुनिक संदर्भ में भी यह कटु सत्य है। आज का मानव उपभोक्तावाद, भौतिक सुखों और तकनीकी चकाचौंध में इतना उलझ गया है कि वह मानवीय मूल्यों, प्रेम, संवेदना और आत्मिक शांति को भूलता जा रहा है। अतः कबीर की चेतावनी आज के युग में और भी अधिक प्रासंगिक है।

Question 13. ‘साखी’ और ‘सबद’ में क्या अंतर है? कबीर ने अपने वचनों को ‘साखी’ नाम क्यों दिया?

Answer: ‘साखी’ वस्तुतः दोहा छंद में रचित उपदेशात्मक रचना है जो ‘साक्षी’ (आँखों देखा प्रत्यक्ष अनुभव) पर आधारित होती है। जबकि ‘सबद’ (पद) गेय पद होते हैं जिनमें राग-रागिनियों के अंतर्गत रहस्यवादी और विरह-मिलन के भाव व्यक्त किए जाते हैं। कबीर ने अपने वचनों को ‘साखी’ इसलिए कहा क्योंकि वे किताबी सुनी-सुनाई बातों के प्रचारक नहीं थे, बल्कि उन्होंने जो सत्य अपनी आँखों से देखा और स्वयं भोगा, उसी का साक्ष्य समाज के समक्ष प्रस्तुत किया।

Question 14. केस स्टडी प्रश्न (Case Study Scenario):एक प्रतिष्ठित विद्यालय के एक अत्यंत मेधावी छात्र को अपनी उच्च बौद्धिक क्षमता और परीक्षा परिणामों पर अत्यधिक घमंड हो गया। वह अपने सहपाठियों को हीन दृष्टि से देखने लगा और शिक्षकों के आलोचनात्मक सुझावों को अस्वीकार करने लगा। परिणामस्वरूप, वह धीरे-धीरे एकाकी हो गया और उसके प्रदर्शन में गिरावट आ गई।’ कबीर की किन्हीं दो साखियों के संदर्भ में उस छात्र की समस्या का निदान प्रस्तुत कीजिए।

Answer: उक्त छात्र की मुख्य समस्या अहंकार (‘मैं’ भाव) और आलोचना को स्वीकार न करना है।

  1. साखी 3 (‘जब मैं था तब हरि नहीं’) के अनुसार: छात्र को यह समझना होगा कि अहंकार ज्ञान और सद्गुणों का सबसे बड़ा शत्रु है। घमंड के रहते वास्तविक विद्या और विवेक की प्राप्ति नहीं हो सकती। उसे अपने ‘आपे’ को मिटाकर विनम्र बनना होगा।
  2. साखी 6 (‘निंदक नेड़ा राखिये’) के अनुसार: छात्र को शिक्षकों और मित्रों के आलोचनात्मक सुझावों को दुर्भावना न मानकर एक अवसर समझना चाहिए। रचनात्मक आलोचना ही मनुष्य की कमियों को दूर कर उसके व्यक्तित्व को निर्मल और उत्कृष्ट बनाती है।

Question 15. कबीर की दृष्टि में सच्चा साधु या भक्त कौन है? उसकी जीवन-शैली कैसी होनी चाहिए?

Answer: कबीर की दृष्टि में सच्चा साधु या भक्त वह नहीं है जो गेरुआ वस्त्र धारण करे या संसार छोड़कर जंगलों में भाग जाए। सच्चा साधु वह है जो:

  • मन के अहंकार को पूर्णतः त्यागकर मीठी और विनम्र वाणी बोलता हो।
  • घट-घट में ईश्वर की सत्ता को देखकर सभी जीवों से निस्वार्थ प्रेम करता हो।
  • सांसारिक प्रलोभनों और मोह-माया से अनासक्त रहकर निष्काम भाव से जनकल्याण में रत रहता हो।
  • आलोचनाओं से विचलित न होकर अपने अंतःकरण को निरंतर पवित्र और सत्यनिष्ठ बनाए रखता हो।

6. CONCLUDING BOARD TOPPER STRATEGY

सीबीएसई कक्षा 10 हिंदी ‘ब’ की बोर्ड परीक्षा में ‘साखी’ अध्याय से शत-प्रतिशत (Full Marks) अंक अर्जित करने के लिए विद्यार्थियों को निम्नलिखित रणनीतियों का कड़ाई से पालन करना चाहिए:

  1. काव्यगत प्रतीकों का अनिवार्य उल्लेख: जब भी ‘दीपक’, ‘अँधियारा’, ‘कस्तूरी’, ‘मृग’, ‘भुवंगम’ या ‘मुराड़ा’ से संबंधित प्रश्न आए, तो उत्तर में उनके आध्यात्मिक और लाक्षणिक अर्थों (जैसे—ज्ञान, अज्ञान, अंतर्व्याप्त ब्रह्म, अहंकार, वैराग्य) को अवश्य लिखें और मुख्य शब्दों को रेखांकित (Underline) करें।
  2. सामान्यीकरण से बचें: उत्तर को केवल दो पंक्तियों के अनुवाद तक सीमित न रखें। कबीर के दार्शनिक दृष्टिकोण (निर्गुण भक्ति, सामाजिक सुधार, आडंबर-विरोध) को उत्तर का आधार बनाएँ।
  3. वर्तनी एवं भाषा-शुद्धि: भक्तिकालीन तद्भव शब्दों (जैसे—माहिं, मुवा, भुवंगम, आपा) का खड़ी बोली में मानक रूप लिखते समय वर्तनी की अशुद्धियों से बचें, क्योंकि भाषा-विषय में वर्तनी की त्रुटियों पर परीक्षक अंक काटते हैं।
  4. प्रस्तुतीकरण शैली: प्रत्येक उत्तर को 2-3 सुगठित अनुच्छेदों (Paragraphs) में विभाजित करें तथा दो प्रश्नों के मध्य स्पष्ट रिक्त स्थान छोड़ें ताकि उत्तर-पुस्तिका अत्यंत स्वच्छ और पठनीय दिखाई दे।

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